वंदे भारत स्लीपर ट्रेन ,रातों की दूरी मिटाती, नए भारत की नई रफ्तार : विनोद कुमार सिंह
विनोद कुमार सिंह (स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार)
रेल यात्रियो के लिए आराम दायक यात्रा,अध्यात्म का आनंद - आर्थिक विकाश की बहार है , जहाँ यात्रा ना केवल अपने गंतव्य पर समय पर पहुंचे, ब्लकि वें यात्रा के लिए दौरान स्थानीय खाना-पान व पकवान व स्थानीय सम्भयता व संस्कृति की झलक से रूह - बरुह होगे ।
भारतीय रेल का इतिहास केवल पटरियों और इंजनों का नहीं,बल्कि यह भारत की सामाजिक चेतना, आर्थिक गतिशीलता और राष्ट्रीय एकता की वह जीवंत गाथा है, जिसमें समय-समय पर राष्ट्रवाद की धड़कन सुनाई देती रही है।आज़ादी के बाद भारतीय रेल ने देश के दूर-दराज़ इलाकों को जोड़ा,लोगों को रोज़गार,शिक्षा,व्यापार और आस्था की यात्राओं से जोड़े रखा। किंतु इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में प्रवेश करते हुए रेल व्यवस्था केवल परिवहन का साधन नहीं रह गई है,वह अब विकास का इंजन बन चुकी है। इसी परिवर्तन कारी यात्रा की अगली महत्त्वपूर्ण कड़ी है " वंदे भारत स्लीपर ट्रेन ", जिसका संभावित उद्घाटन स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किया जाना है।
वंदे भारत स्लीपर ट्रेन केवल एक नई रेल सेवा नहीं है,बल्कि यह भारत में रात्रीकालीन लंबी दूरी की यात्रा की पूरी अवधारणा को पुनर्परिभाषित करने वाला राष्ट्रीय परियोजना की परिकल्पना है।यह उस भारत की आकांक्षा का प्रतीक है,जो गति भी है, सुरक्षित भी है,आरामदेह भी है और आत्मनिर्भर भी है।यह उस सोच का विस्तार है जिसमें विकास केवल दिन की रोशनी तक सीमित नहीं रहता,बल्कि रात की शांति में भी निरंतर आगे बढ़ता है।सर्वविदित रहे कि वर्ष 2019 में जब पहली वंदे भारत एक्सप्रेस राष्ट्र को समर्पित की गई थी,तब वह केवल एक आधुनिक ट्रेन नहीं थी,बल्कि यह संकेत था कि भारत अब आयातित तकनीक का उपभोक्ता नहीं रहेगा।वंदे भारत एक्सप्रेस पूरी तरह मेक-इन-इंडिया पहल का परिणाम थी—डिज़ाइन से लेकर निर्माण तक।उसी स्वदेशी सोच का स्वाभाविक विस्तार अब वंदे भारत स्लीपर ट्रेन के रूप में सामने आ रहा है।
जहाँ वंदे भारत एक्सप्रेस ने दिन की तेज़ यात्रा को नया आयाम दिया,वहीं वंदे भारत स्लीपर का लक्ष्य है।भारत की लंबी दूरी की रात्री यात्राओं को गति, सुविधा और भरोसे के साथ जोड़ना।
इस ट्रेन की मूल अवधारणा स्पष्ट है। जहाँ लगभग आठ सौ से बारह सौ किलोमीटर की दूरी को एक ही रात में तय करना।यह कोई साधारण लक्ष्य नहीं है।भारत जैसे विशाल देश में यह दूरी अक्सर हवाई यात्रा और रेल यात्रा के बीच चयन की दुविधा पैदा करती है।
वंदे भारत स्लीपर इसी दुविधा को समाप्त करने की दिशा में एक ठोस कदम है।यह ट्रेन उन यात्रियों के लिए एक किफायती और भरोसेमंद विकल्प प्रस्तुत करती है, जो समय की कमी के कारण मजबूरी में महँगी हवाई यात्रा करते हैं।रात में ट्रेन में सवार होकर सुबह गंतव्य तक पहुँचना,बिना अतिरिक्त खर्च और बिना हवाई अड्डों की जटिलताओं के—यह सुविधा मध्यम वर्ग,नौकरीपेशा और तीर्थयात्रियों सभी के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
यदि इस परिप्रेक्ष्य में 17 जनवरी की उस यात्रा की कल्पना की जाए,जब एक श्रद्धालु पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से प्रस्थान करता है,तो यह यात्रा केवल भौगोलिक नहीं रह जाती। कोलकाता का प्राचीन कालीघाट मंदिर,जहाँ माँ काली की शक्ति और करुणा में सदियों से लोकआस्था बहती रही है,वहाँ दर्शन के बाद रात में वंदे भारत स्लीपर ट्रेन में बैठा यात्री केवल स्टेशन नहीं छोड़ता,वह अपने भीतर श्रद्धा और विश्वास का संबल लेकर आगे बढ़ता है ट्रेन रात के अंधेरे को चीरते हुए आगे बढ़ती है और यह यात्रा धीरे-धीरे एक आध्यात्मिक अनुभव में बदल जाती है।
रेल यात्रियो के लिए आराम दायक यात्रा,अध्यात्म का आनंद-आर्थिक विकाश की बहार है,जहाँ यात्रा ना केवल अपने गंतव्य पर समय पर पहुंचे,ब्लकि वें यात्रा के लिए दौरान स्थानीय खाना-पान व पकवान व स्थानीय सम्भयता व संस्कृति की झलक से रूह - बरुह होगे ।* तकनीकी दृष्टि से वंदे भारत स्लीपर ट्रेन भारतीय रेल के इतिहास में एक निर्णायक छलांग है।यह सेमी-हाई स्पीड श्रेणी की ट्रेन होगी,जिसकी व्यावसायिक गति लगभग एक सौ साठ किलोमीटर प्रति घंटा तक रखी गई है।
पूरी तरह इलेक्ट्रिक और वितरित पावर प्रणाली पर आधारित यह ट्रेन न केवल तेज़ है,बल्कि ऊर्जा दक्ष भी है। इसका निर्माण भारतीय इंजीनियरिंग क्षमता का प्रमाण है, जिसमें नब्बे प्रतिशत से अधिक सामग्री स्वदेशी है।यह आत्मनिर्भर भारत की उस सोच को साकार करती है, जिसमें तकनीक केवल गति नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का माध्यम बनती है।रात के सफर में सुरक्षा सबसे बड़ा प्रश्न रहा है। वंदे भारत स्लीपर ट्रेन इसी चिंता का उत्तर है। स्वदेशी कवच टक्कर-रोधी प्रणाली,आधुनिक ब्रेकिंग सिस्टम, अग्नि सुरक्षा तकनीक और सीसीटीवी निगरानी इसे पारंपरिक रात्री ट्रेनों से अलग पहचान देती है। यह भरोसा देती है कि आधुनिक भारत में रात की यात्रा भी उतनी ही सुरक्षित और सम्मानजनक हो सकती है,जितनी दिन की।
आराम और यात्री अनुभव के स्तर पर यह ट्रेन स्लीपर यात्रा की परिभाषा बदल देती है। कंपन रहित कोच,बेहतर सस्पेंशन,नियंत्रित तापमान,होटल-स्तरीय बेडिंग और स्वच्छ,स्पर्श-रहित शौचालय यात्रियों को मानसिक और शारीरिक विश्राम का अनुभव कराते हैं।कोलकाता से गुवाहाटी की यह रात्री यात्रा अब केवल दूरी तय करने का साधन नहीं रहती,बल्कि आत्मिक शांति का माध्यम बन जाती है।सुबह जब ट्रेन गुवाहाटी पहुँचती है,तो माँ कामाख्या देवी के दिव्य दर्शन के लिए बढ़ते कदमों में थकान नहीं,बल्कि ऊर्जा और श्रद्धा होती है।
आर्थिक दृष्टि से भी वंदे भारत स्लीपर ट्रेन भारतीय रेल के लिए दूरदर्शी निवेश है।यह हवाई यात्रा का किफायती विकल्प बनकर न केवल यात्रियों के खर्च को कम करती है, बल्कि पर्यावरण पर पड़ने वाले बोझ को भी घटाती है।कम कार्बन उत्सर्जन और ऊर्जा दक्ष संचालन इसे हरित परिवहन की दिशा में एक मजबूत कदम बनाते हैं।इस परियोजना का सामाजिक प्रभाव भी व्यापक है।यह ट्रेन केवल कोलकाता और गुवाहाटी जैसी राजधानियों को नहीं जोड़ती, बल्कि उनके बीच बसे उन क्षेत्रों को भी विकास की मुख्यधारा से जोड़ती है, जिनकी उपेक्षा अब तक रात्री रेल सेवाओं में होती रही है।यह बंगाल और असम की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक चेतना को एक सूत्र में पिरोने का कार्य करती है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा वंदे भारत स्लीपर ट्रेन के संभावित उद्घाटन का प्रतीकात्मक अर्थ भी गहरा है।यह उस राजनीतिक इच्छाशक्ति का संकेत है,जो बुनियादी ढाँचे को केवल आँकड़ों की उपलब्धि नहीं,बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास का आधार मानती है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के नेतृत्व में भारतीय रेल जिस निरंतरता से सुरक्षा,तकनीक और सेवा गुणवत्ता में सुधार कर रही है, वंदे भारत स्लीपर उसी यात्रा की अगली स्वाभाविक कड़ी है।अंततः वंदे भारत स्लीपर ट्रेन इस सदी के भारत की वह घोषणा है, जिसमें कहा जा सकता है कि विकास अब दिन तक सीमित नहीं रहा।
जब जल्द ही किसी शांत रात को कोलकाता से चली ट्रेन सुबह गुवाहाटी पहुँचती है और यात्री अपने आराध्य माँ कामाख्या देवी के दिव्य दर्शन के लिए श्रद्धा से आगे बढ़ता है,तब यह स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल एक यात्रा नहीं थी। यह आधुनिकता, आस्था और राष्ट्रनिर्माण की साझा यात्रा थी।जब देश की रातें भी तेज़,सुरक्षित और सम्मानजनक यात्रा से भर जाएँ,तब समझना चाहिए कि परिवर्तन केवल पटरियों पर नहीं, बल्कि नई सोच और मानवीय संवेदना में भी उतर चुका है।


