शब्दों से परे प्यार का अपार संसारः फोर्टिस हॉस्पीटल में दो सफल जीवनरक्षक किडनी ट्रांसप्लांट्स हुए संपन्न

शब्दों से परे प्यार का अपार संसारः फोर्टिस हॉस्पीटल में दो सफल जीवनरक्षक किडनी ट्रांसप्लांट्स हुए संपन्न

वेलेंटाइन डे के असली संदेश को बनाया सार्थक

नोएडा: इस वैलेंटाइन डे के अवसर पर दो दंपत्तियों ने प्यार की जबर्दस्त मिसाल कायम की है। फोर्टिस हॉस्पीटल, नोएडा में इन दो असाधारण जोड़ियों ने वो कर दिखाया जिसने एक-दूसरे के प्रति प्रेम और समर्पण को गुलाबों और वायदों से कहीं आगे पहुंचा दिया है। दोनों मामलों में, दो पत्नियों ने अपने-अपने जीवनसाथी का जीवन बचाने के लिएअपना गुर्दा दानदेकर साहस, समर्पण, त्याग और अटूट प्रेमभाव की ऐसी कहानी लिख डाली है जिसने यह साबित किया है कि प्यारकेवल जताया नहीं जाता, बल्कि जिया भी जाता है।

57-वर्षीय जयपाल के2017 में क्रोनिक लिवर रोग से पीड़ित होने की पुष्टि होने के बाद सफल लिवर ट्रांसप्लांट किया गया जिसके लिए उनके बेटे ने डोनर की भूमिका निभायी थी। लेकिन 2020 में उनका किडनी फंक्शन बिगड़ने लगा। 2025 के अंत तक आते-आते उन्हें हेमोडायलिसिस मेंटीनेंस की जरूरत पड़ने लगी थी। पोस्ट-लिवर ट्रांसप्लांट मरीज होने की वजह से उनकी इम्युनिटी पहले ही काफी कमजोर हो चुकी थी। लंबे समय तक डायलिसिस के चलते गंभीर किस्म के इंफेक्शन का भी खतरा था और इसकी वजह से उनके ट्रांसप्लांटेड लिवर के लिए भी जोखिम था। परिवार में अन्य कोई उपयुक्त डोनर नहीं था और उनके बचने की संभावना लगातार कम होती देखकर,  उनकी पत्नी ने कॉम्पेटिबल पार्टनर के तौर पर गुर्दा दान करने पहल की। यह सर्जरी इस वजह से काफी चुनौतीपूर्ण हो गई थी कि इस ट्रांसप्लांट के लिए काफी सावधानी और सटीकता की जरूरत थी ताकि गुर्दा प्रत्यारोपण के दौरान मरीज का लिवर फंक्शन प्रभावित न हो। इस 3.5 घंटे लंबी

चली जटिल सर्जरी को फोर्टिस नोएडा के डॉक्टरों की टीम ने सफलतापूर्वक पूरा किया। अब श्री जयपाल स्थिर जीवन जी रहे हैं, डायलसिस-मुक्त हैं और नियमित रूप से फौलो-अप के लिए आ रहे हैं, और यह सब उनकी पत्नी के निस्सवार्थ फैसले की वजह से मुमकिन हुआ है।

एक अन्य मामले में, 48-वर्षीय अमित कुमार को 2020 में हाइपरटेंशन से ग्रस्त पाया गया लेकिन वह दवा को लेकर अनुशासित नहीं थे और बीच-बीच में कई अन्य वैकल्पिक उपचारों को भी अपना रहे थे। नवंबर 2025 तक आते-आते उनका क्रिटनाइन लेवल काफी खतरनाक ढंग से बढ़ चुका था। कुछ ही हफ्तों में उनका किडनी फंक्शन बुरी तरह से प्रभावित हुआ और उन्हें तत्काल डायलसिस की आवश्यकता हुई। वह काफी कुपोषित, एनीमिक, इम्युनोकॉम्प्रोमाइज़्ड और शरीर में टॉक्सिन जमा होने की वजह से न्यूरोलॉजिकली भी प्रभावित हो चुके थे। परिवार के अकेले कमाने वाले सदस्य होने के बाद, सप्ताह में तीन बार डायलसिस कराना शारीरिक और वित्तीय रूप से चुनौतीपूर्ण था। उनके बुजुर्ग माता-पिता डोनेट करने लायक नहीं थे। ऐसे में उनकी पत्नी ने पति को अपना गुर्द दान करने का फैसला किया।

बोन मैरो बायप्सी समेत अन्य प्रकार की विस्तृत मेडिकल जांच के बाद यह पाया गया कि लंबे समय तक वैकल्पिक दवाओं के सेवन के कारण उनके शरीर में ब्लड सैल प्रोडक्शन काफी प्रभावित हो चुका था। अस्पताल के डॉक्टरों की टीम ने उनका सफल ट्रासंप्लांट किया। आज दोनों पत्नी-पत्नी सामान्य जीवन बिता रहे हैं, और मरीज श्री अमित कुमार डायलसिस से भी मुक्तहैं।

इन मामलों की जानकारी देते हुए, डॉ अनुजा पोरवाल, डायरेक्टर ऑफ नेफ्रोलॉजी, फोर्टिस हॉस्पीटल नोएडा ने कहा, एंड-स्टेज किडनी रोग से पीड़ित मरीजों, और खासतौर से डायलसिस को सहन नहीं कर सकने वाले लोगोंके लिए या जिनमें कुछ अतिरिक्त मेडिकल जटिलताएं होती हैं,किडनी ट्रांसप्लांटेशन ही एकमात्र ऐसा विकल्प है जो उन्हें जीवनदान दे सकता है। समय पर ट्रांसप्लांट नहीं होने पर, इन मरीजों के बचने की संभावना काफी सीमित रह जाती है। इन दोनों मामलों को

केवल मेडिकल सफलता ने ही खास नहीं बनाया बल्कि दोनों मरीजों की जीवनसंगिनियों द्वारा प्रदर्शित साहस ने सही मायने में काफी अलग भी बनाया है। लिविंग ऑर्गेन डोनेशन वाकई निस्स्वार्थ भावना को प्रदर्शित करता है। इस वैलेंटाइन डे के मौके पर इन कपल्स ने एक बार फिर यह याद दिलाया है कि प्यार केवल कोरी भावना नहीं होता बल्कि यह जीवनरक्षा का निर्णय भी होता है।”

मोहित सिंह, जोनल डायरेक्टर, फोर्टिस हॉस्पीटल नोएडा ने कहा, इन दोनों मामलों ने केवल मेडिकल उत्कृष्टता को ही नहीं बल्कि प्रतिकूल हालातों में भी एक-दूसरे के साथ खड़े होने की परिवारों की प्रगाढ़ ताकत भी प्रदर्शित की है। भारत में, अधिकांश रूप से महिलाएं – जिनमें पत्नियां, माताएं, बहनें शामिल होती हैं, लिविंग किडनी डोनर के तौर पर सामने आयी हैं। इस बार वैलेंटाइन डे के मौके पर, फोर्टिस हेल्थकेयर ने उन कपल्स का जश्न मनाया है जिन्होंने अपने-अपने संकल्पों को साकार कर दिखाया है। उनके सफर ने इस ताकतवर संदेश को दोहराया है कि अंगदान का फैसला केवल चिकित्सकीय फैसला नहीं है, बल्कि बिना शर्त प्यार करना है।”