आत्मनिर्भरता के लिए भारत की आत्मा को समझना जरूरी- गोविंदाचार्य

आत्मनिर्भरता के लिए भारत की आत्मा को समझना जरूरी- गोविंदाचार्य

नई दिल्ली। प्रसिद्ध चिंतक के. एन. गोविंदाचार्य ने कहा कि निर्भरता में दासत्व नहीं होता। इसमें सहयोग का भाव प्रधान होता है। देश की आत्मनिर्भरता के लिए भारत के आत्म को समझना जरूरी है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की ओर से ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी स्मारक व्याख्यान’ में गोविंदाचार्य ने कहा कि भारत की परम्परा में सहयोग और साहचर्य रहा है। आज भी देशभर के लाखों सरोवर, पशुधन और वनसंपदा आत्मनिर्भरता के कारक बन सकते हैं। व्याख्यान आयोजन की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने की, जबकि आधार वक्तव्य कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने रखा।

गोविंदाचार्य ने संस्कृत, पालि, प्राकृत ग्रंथों, खासकर ईशावास्योपनिषद के पहले श्लोक “ईशा वास्यम् इदं सर्वम्...” का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रकृति को ईश्वर का मानते हुए उसे अनासक्त भाव से उपयोग करने की सीख हमें परम्परा से ही मिली है। वर्ष 1493 में कोलम्बस के ‘नई दुनिया की खोज’ से ‘मनुष्य ही सब कुछ है’ का भाव पैदा हुआ। फिर उपनिवेशवाद से दर्शन और व्यवहार में फर्क आया। तब जरूरत स्वत्व बोध की थी। आज भी यह बोध आवश्यक है। दुनिया की 17 प्रतिशत आबादी भारत में है। हम अपने पारम्परिक संसाधनों को व्यवस्थित कर उन्हें आगे बढ़ाते हुए स्वयं के साथ दुनिया के दूसरे लोगों की जरूरतें भी पूरी कर सकते हैं।

आयोजन के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने कहा कि गोविंदाचार्य का यह वक्तव्य सूत्रों में है। इसका भाष्य होना है। हाल के कुछ वर्षों में रोजगार तलाशने की जगह नये उद्यमी सामने आये हैं। आज आत्मनिर्भर भारत की कूंजी पकड़ना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जिस हजारी प्रसाद जी की स्मृति में व्याख्यान हो रहा है, उन्होंने भी विश्व हिंदी सम्मेलन में कहा था कि भारत एक दिन दुनिया का सबसे समर्थ, सशक्त देश बनेगा। हजारी प्रसाद द्विवेदी की कल्पना का समर्थ भारत ही आत्मनिर्भर भारत है।     

प्रारम्भ में विषय के आधार वक्तव्य में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राष्ट्रपिता गांधी जी का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि बापू हर उस याद और चिह्नों से मुक्त होने की बात करते थे, जिनसे गुलामी का भाव आता है। हमें अपनी कृति के साथ विचार और मन से भी आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ना चाहिए। प्रारम्भ में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के डीन प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने गोविदाचार्य और अन्य अतिथियों का स्वागत किया। संचालन कलानिधि विभाग के सुनील डे ने किया।