उहापो हेल्थ 4th कैंसर कॉन्क्लेव मरीजों और उनकी वास्तविक चुनौतियों पर फिर से केंद्रित

उहापो हेल्थ 4th कैंसर कॉन्क्लेव मरीजों और उनकी वास्तविक चुनौतियों पर फिर से केंद्रित

देखभाल पर राष्ट्रीय संवाद का किया गया आयोजन, कैंसर को नोटिफाएबल बीमारी बनाने की मांग, क्लिनिकल ट्रायल में पारदर्शिता की आवश्यकता

उहापो हेल्थ सर्विसेज ने अपना चौथा वार्षिक कैंसर कॉन्क्लेव आयोजित किया, जिसमें मरीजों, डॉक्टरों, कैंसर सर्वाइवर्स, देखभाल करने वालों, नीति निर्माताओं, उद्योग प्रतिनिधियों और पत्रकारों ने भाग लिया।  इस कार्यक्रम को आयोजित करने का मुख्य उद्देश्य भारत में कैंसर देखभाल प्रणाली को अधिक संवेदनशील, पारदर्शी और मरीज-केंद्रित बनाना है।

यह वर्चुअल कॉन्क्लेव 'मरीजों की पैरवी सबसे पहले: कैंसर देखभाल के केंद्र में मरीज की आवाज' विषय पर केंद्रित था। इस कॉन्क्लेव में मरीजों की पूरी यात्रा के हर चरण की वास्तविकताओं पर चर्चा की गई। साथ ही, कैंसर के शुरुआती लक्षणों, कैंसर के इलाज के दौरान मरीज व उसके परिवार पर पड़ने वाला आर्थिक दबाव और कैंसर के बाद जीवन कैसा हो जाता है, इस विषय पर चर्चा की गई।

कॉन्क्लेव का उद्घाटन करते हुए  उहापो के संस्थापक विवेक शर्मा ने कहा- स्वास्थ्य बजट में बढ़ोतरी और केयरगिवर प्रशिक्षण जैसे कदम सकारात्मक हैं, लेकिन असली बदलाव तभी आएगा जब ये योजनाएं हर जरूरतमंद मरीज तक पहुंचें। कैंसर केवल एक व्यक्ति की बीमारी नहीं, बल्कि पूरे परिवार की चुनौती है। उन्होंने बताया कि मरीजों और उनके परिवारों के लिए समग्र सहयोग प्रणाली विकसित करना समय की आवश्यकता है।  विवेक शर्मा ने कहा- जब यह कॉन्क्लेव खत्म होगा, तो हम इसे सिर्फ ‘अच्छी चर्चा’ कहकर नहीं छोड़ेंगे। हम एक स्पष्ट, कार्य-आधारित स्टेकहोल्डर रिपोर्ट जारी करेंगे, जिसमें 12 से 24 महीने का रोडमैप होगा, ताकि कैंसर के इलाज में जो मुश्किल आ रही हैं, उसका असली काम तुरंत शुरू हो सके।

डॉ. राजीत चनाना, मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट, धर्मशिला नारायणा सुपरस्पेशियलिटी हॉस्पिटल, दिल्ली ; ने कहा- जब सामाजिक प्रभाव से जुड़े प्लेटफॉर्म अधिक पारदर्शी बनते हैं, तो डॉक्टरों को यह भरोसा बढ़ता है कि मदद सही जगह तक पहुंच रही है। लेकिन कोई एक माध्यम अकेले इस समस्या का समाधान नहीं कर सकता है। सरकारी योजनाओं, बीमा, एनबीएफसी, सीएसआर और क्राउडफंडिंग को एक साथ मिलकर काम करना होगा। भविष्य में कैंसर से बचाव के लिए इलाज की सुविधाओं को मजबूत करना तो जरूरी है ही, साथ ही साथ हम कैंसर की रोकथाम कैसे की जा सकती है, इस पर फोकस करना और इस क्षेत्र में निवेश करना जरूरी है- क्योंकि किसी भी बीमारी में रोकथाम हमेशा इलाज से बेहतर होती है।

चर्चा के दौरान विशेषज्ञों ने कहा कि सीमित समय और कम जागरूकता के कारण मरीजों को इलाज से जुड़ी संपूर्ण जानकारी नहीं मिल पाती। इसके परिणामस्वरूप भावनात्मक, पोषण और पुनर्वास सेवाएं अक्सर पीछे रह जाती हैं। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने मरीजों के लिए समर्पित काउंसलिंग सिस्टम को मजबूत करने पर फोकस बढ़ाने की बात भी कही।

कैंसर को नोटिफाएबल बीमारी बनाने की मांग - कॉन्क्लेव में यह मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया कि भारत में कैंसर को अब तक नोटिफाएबल बीमारी का दर्जा नहीं मिला है। वक्ताओं के अनुसार, कैंसर को नोटिफाएबल बीमारी बनाने के बाद इसके सटीक आंकड़े उपलब्ध होंगे और नीति निर्माण में सुधार सही तरीके से किया जा सकेगा।  

आर्थिक बोझ और सहायता योजनाओं की सीमाएं - कॉन्क्लेव में यह तथ्य सामने आया कि किसी भी मरीज के लिए का कैंसर इलाज सिर्फ मेडिकल ट्रीटमेंट तक ही सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इलाज के दौरान होने वाला ट्रैवल का खर्चा, दूसरे शहर में जाकर रहने वालों के लिए घर का किराया और इलाज के दौरान होने वाले देखभाल से जुड़े खर्च परिवारों को गंभीर आर्थिक संकट में डाल देते हैं। इस दौरान डॉक्टरों और विशेषज्ञों ने सरकारी योजनाओं में कैंसर के मरीजों के लिए टॉप-अप विकल्प, सरल सहायता प्रक्रियाओं और मॉलिक्यूलर जांच को कवर करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कैंसर के कंसेंट फॉर्म स्थानीय भाषा में होने चाहिए- डॉ. घनश्याम बिस्वास

*भुवनेश्वर से वरिष्ठ मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. घनश्याम बिस्वास* ने कहा- "कई बार सहमति पत्र (कंसेंट फॉर्म) इतने लंबे और जटिल होते हैं कि लोग उन्हें ठीक से समझे बिना ही, बैंक के कागजों की तरह, हस्ताक्षर कर देते हैं। असल जरूरत ‘मोटा-मोटी’ स्पष्टता की होती है कि यह ट्रायल उनके लिए क्यों सही है, इसके मुख्य जोखिम क्या हैं, अगर कुछ गलत हो जाए तो क्या सहायता मिलेगी और इस पूरे प्रोसेस से उनके इलाज पर क्या असर पड़ेगा।

डॉ. घनश्याम बिस्वास ने इस बात पर भी जोर दिया कि कैंस के मरीजों को कंसेंट फॉर्म सिर्फ इंग्लिश और हिंदी में नहीं, बल्कि स्थानीय भाषा में दिए जाने चाहिए। इससे व्यक्ति को कंसेंट फॉर्म के बारे में सही जानकारी मिल सकेगी। डॉ. घनश्याम बिस्वास ने यह भी कहा कि कंसेंट फॉर्म की जानकारी दिए जाने के बाद मरीज के परिवार को एक-दो दिन के लिए घर ले जाने का समय मिलना चाहिए, और फिर उनके सवालों पर बैठकर चर्चा होनी चाहिए तभी सहमति वास्तव में समझदारी और जानकारी के साथ दी गई मानी जाएगी।

इस सम्मेलन में देशभर से कई प्रमुख विशेषज्ञों ने बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम में डॉ. सेवंटी लिमये, निदेशक, प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी, सर एच. एन. रिलायंस हॉस्पिटल, मुंबई; डॉ. नंदिनी मेनन और डॉ. मिनित शाह, प्रोफेसर एवं मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट, टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल; डॉ. राजीत चनाना, मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट, धर्मशिला नारायणा सुपरस्पेशियलिटी हॉस्पिटल, दिल्ली; डॉ. बिकास मेधी, चेयरमैन, IUPHAR – बेसिक एंड ट्रांसलेशनल सेक्शन; डॉ. सुधा चंद्रशेखर, पूर्व कार्यकारी निदेशक, नेशनल हेल्थ अथॉरिटी (NHA); श्री प्रभात सिन्हा, निदेशक – पब्लिक एंड गवर्नमेंट अफेयर्स, बोहरिंगर इंगेलहाइम; और सुश्री कुहेली दासगुप्ता, सीनियर कंसल्टेंट, फार्मास्यूटिकल्स विभाग, भारत सरकार सहित कई अन्य विशेषज्ञ भी शामिल थे।