बढ़ती प्रदूषण की चादर के बीच फेफड़ों की सेहत पर जीवनभर ध्यान जरूरी
विश्व फेफड़ा दिवस 25 सितंबर पर विशेष
दिल्ली/नोएडा: सितंबर आते ही दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण का स्तर धीरे-धीरे बढ़ने लगा है और सुबह के समय हल्की धुंध भी दिखाई देने लगी है। बदलते मौसम के साथ हवा की गुणवत्ता में गिरावट फेफड़ों और सांस की सेहत के लिए चिंता बढ़ा रही है। बढ़ता वायु प्रदूषण, धूम्रपान, वेपिंग और कार्यस्थल पर धूल-धुएं का संपर्क फेफड़ों को प्रभावित कर रहा है। बदलती जीवनशैली और पर्यावरणीय कारकों के कारण अस्थमा, सीओपीडी, ब्रोंकाइटिस, एलर्जी और बार-बार होने वाले श्वसन संक्रमण जैसी समस्याएं अलग-अलग आयु वर्गों में देखने को मिल रही हैं। विश्व फेफड़ा दिवस 2026 की थीम “ए लाइफटाइम ऑफ लंग हेल्थ” है, जो जीवन के हर चरण में फेफड़ों की सेहत को प्राथमिकता देने के महत्व को रेखांकित करती है।
डॉ. अरुणाचलम एम., वरिष्ठ सलाहकार- पल्मोनोलॉजी ने कहा कि “हमारी ओपीडी में लगभग 60–70% मरीज फेफड़ों या सांस से संबंधित शिकायतों जैसे खांसी, सांस फूलना, घरघराहट और बार-बार होने वाले संक्रमण के साथ आते हैं। अस्थमा, सीओपीडी, श्वसन संक्रमण, एलर्जिक राइनाइटिस, निमोनिया, ब्रोंकाइटिस और नींद से संबंधित श्वसन विकार प्रमुख स्थितियां हैं।
फेफड़ों से संबंधित मरीजों में लगभग 60% पुरुष और 40% महिलाएं हैं। मध्यम आयु वर्ग और बुजुर्गों में लंबे समय से चली आ रही फेफड़ों की बीमारियां अधिक देखने को मिलती हैं, हालांकि बच्चे, धूम्रपान करने वाले तथा वायु प्रदूषण या कार्यस्थल पर हानिकारक पदार्थों के संपर्क में रहने वाले लोग भी जोखिम में हैं। वायु प्रदूषण, धूम्रपान और वेपिंग से जुड़े श्वसन लक्षणों के मामले कम उम्र के लोगों में भी बढ़ रहे हैं। फेफड़ों की सुरक्षा के लिए तंबाकू से बचना, प्रदूषण का संपर्क कम करना, नियमित शारीरिक गतिविधि और स्वस्थ जीवनशैली जरूरी है। बचपन से फेफड़ों की सुरक्षा, लगातार बने रहने वाले लक्षणों की समय पर पहचान और उचित चिकित्सकीय जांच महत्वपूर्ण है।”
डॉ. (ब्रिगेडियर) सरविंदर सिंह, एचओडी – पल्मोनोलॉजी ने कहा कि “हमारी ओपीडी में लगभग 20–30 प्रतिशत मरीज सांस से जुड़ी समस्याओं के साथ आते हैं, जिनमें अस्थमा, सीओपीडी, सांस से जुड़ी एलर्जी, बार-बार होने वाले छाती के संक्रमण, ब्रोंकाइटिस, लंबे समय से रहने वाली खांसी, घरघराहट और सांस फूलना शामिल हैं। सीओपीडी और धूम्रपान से जुड़ी फेफड़ों की समस्याएं पुरुषों में अधिक देखने को मिलती हैं, जबकि अस्थमा और सांस से जुड़ी एलर्जी पुरुषों और महिलाओं दोनों को प्रभावित करती है। वायु प्रदूषण, धूम्रपान, वेपिंग, कार्यस्थल पर धूल-धुएं का संपर्क और मौसमी संक्रमण इन समस्याओं को बढ़ा रहे हैं। लगातार खांसी, सांस फूलने या घरघराहट को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच से फेफड़ों की समस्याओं की पहचान और सही इलाज में मदद मिल सकती है।”
डॉ. पुनीत गुप्ता, एचओडी – पल्मोनोलॉजी, इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजी एवं स्लीप मेडिसिन ने कहा कि “हमारे ओपीडी में सांस से जुड़ी परेशानी लेकर आने वाले 90 प्रतिशत से ज्यादा मरीजों में दमा, सांस की एलर्जी, बार-बार होने वाले संक्रमण, ब्रोंकाइटिस, सीओपीडी, लंबे समय से रहने वाली खांसी, सांस फूलना और सांस लेते समय घरघराहट जैसी समस्याएं देखने को मिल रही हैं। इनमें पुरुषों और महिलाओं की संख्या लगभग बराबर है, जिससे स्पष्ट होता है कि सांस से जुड़ी समस्याएं किसी एक लिंग तक सीमित नहीं हैं। बढ़ता वायु प्रदूषण, धूम्रपान, कार्यस्थल पर धूल-धुएं का संपर्क और एलर्जी इन समस्याओं को बढ़ा रहे हैं। तंबाकू से दूर रहना, प्रदूषित हवा और धूल-धुएं से बचना, शारीरिक रूप से सक्रिय रहना तथा लंबे समय तक रहने वाली खांसी, सांस फूलने या घरघराहट पर समय पर डॉक्टर से जांच करवाना जरूरी है।”
डॉ. इंदर मोहन चुघ, वाइस चेयरमैन एवं एचओडी – पल्मोनोलॉजी ने कहा कि “फेफड़ों का स्वास्थ्य सभी आयु वर्गों के लिए चिंता का विषय है। श्वसन संबंधी समस्याएं अब कम उम्र के मरीजों और धूम्रपान न करने वाले लोगों में भी तेजी से देखने को मिल रही हैं। हमारे पल्मोनोलॉजी ओपीडी में लगभग 80% परामर्श सीओपीडी और ब्रोन्कियल अस्थमा से संबंधित होते हैं। मरीजों में पुरुषों और महिलाओं का अनुपात लगभग 60:40 है, हालांकि यह बीमारी के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
लगातार खांसी, सांस फूलना, घरघराहट, श्वसन संक्रमण और एलर्जी भी आम समस्याएं हैं। लंबे समय से चली आ रही श्वसन संबंधी बीमारियों का बोझ 50 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में सबसे अधिक है, लेकिन बच्चे, धूम्रपान करने वाले, बुजुर्ग तथा वायु प्रदूषण या कार्यस्थल से जुड़े जोखिमों के संपर्क में रहने वाले लोग भी संवेदनशील हैं। दिल्ली-एनसीआर में खराब वायु गुणवत्ता लक्षणों को और बढ़ा सकती है। तंबाकू से बचना, प्रदूषण का संपर्क कम करना, नियमित शारीरिक गतिविधि, आवश्यक टीकाकरण और लगातार बने रहने वाले लक्षणों पर समय पर चिकित्सकीय जांच जरूरी है।”
विशेषज्ञों के अनुसार, फेफड़ों की सेहत को बनाए रखना बचपन से ही जरूरी है। धूम्रपान और वेपिंग से बचने, वायु प्रदूषण के संपर्क को कम करने, नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और पर्याप्त नींद जैसी स्वस्थ आदतों को जीवनशैली का हिस्सा बनाना चाहिए। लगातार खांसी, सांस फूलना या घरघराहट जैसे लक्षण दिखाई देने पर समय पर चिकित्सकीय जांच कराना फेफड़ों के स्वास्थ्य की बेहतर देखभाल में मदद कर सकता है।


