दिल्ली, सूर घाट (यमुना तट) : भारत की पवित्र गंगा एवं उनकी सहायक नदियाँ आज शहरी कचरा, औद्योगिक रिसाव, सीवेज तथा अत्यधिक बाँधों, डायवर्जन और संरचनाओं के कारण अपना प्राकृतिक जैविक स्वरूप लगभग नष्ट कर चुकी हैं। विशेष रूप से यमुना दिल्ली में औद्योगिक अपशिष्ट, ठोस कचरा और अनुपचारित सीवेज के भारी प्रदूषण से इतनी दूषित हो चुकी है कि उसका जल नहाने योग्य भी नहीं रहा।
राजीव मिश्रा के नेतृत्व में सूर घाट, यमुना तट, दिल्ली पर 30 मार्च 2025 से प्रत्येक रविवार को सत्याग्रह एवं उपवास के माध्यम से "गंगा एक्ट" (The Ganga Protection Act) बनाने तथा माँ गंगा एवं उनकी सहायक नदियों (यमुना, चंबल, गोमती, गंडक, कोसी आदि) के प्राकृतिक, अविरल प्रवाह को बहाल करने की मांग की जा रही है।
सरकारी स्थिति एवं प्रयासों की कमी: भारत सरकार ने 2016 में अधिसूचित किया था कि भागीरथी से गंगासागर तक गंगा में मिलने वाली सभी नदियाँ इसकी सहायक नदियाँ मानी जाएँगी।
राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण (NGRBA) एवं राष्ट्रीय मिशन फॉर क्लीन गंगा (NMCG) जैसी संस्थाएँ मौजूद हैं, जिनके अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं तथा सदस्यों में संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री एवं अधिकारी शामिल हैं। इन संस्थाओं को पत्राचार द्वारा अनुरोध किया जा चुका है।
जिला स्तर पर जिलाधिकारी इनकी निगरानी करते हैं, किंतु इन पर कोई वैधानिक बाध्यता नहीं है, जिससे योजनाओं के क्रियान्वयन में उदासीनता बनी रहती है।
प्रदूषण या उल्लंघन के मामलों में एकमात्र राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ही उपलब्ध है, जो पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 की धारा 5 के तहत कार्य करता है। यह प्रक्रिया लंबी एवं जटिल होने से त्वरित कार्रवाई संभव नहीं हो पाती।
गंगा एक्ट की आवश्यकता एवं लाभ: "गंगा एक्ट" लागू होने से जिला स्तर पर ही प्रदूषण फैलाने वालों (औद्योगिक इकाइयाँ, नगर निकाय आदि) के खिलाफ त्वरित कानूनी कार्रवाई संभव होगी। इससे सरकारी अधिकारियों एवं स्थानीय प्रशासन को योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए जवाबदेह बनाया जा सकेगा, जिससे गंगा एवं सहायक नदियों की स्वच्छता में स्वतः सुधार आएगा।
अंतरराष्ट्रीय उदाहरण: राइन नदी (यूरोप) 1960-70 के दशक में विश्व की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक थी। स्विट्जरलैंड, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड्स एवं लक्जमबर्ग ने मिलकर राइन संरक्षण आयोग गठित किया तथा सख्त कानून लागू किए। आज यह नदी स्वच्छता एवं जैव-विविधता में उत्कृष्ट है। इसी प्रकार गंगा के संरक्षण हेतु सख्त, समर्पित कानून की आवश्यकता है।
सरकार की घोषणा एवं वर्तमान स्थिति: 2018 में भारत सरकार के जल मंत्री ने प्रेस ब्यूरो के समक्ष घोषणा की थी कि गंगा एक्ट जल्द कैबिनेट में पास कर संसद में पेश किया जाएगा। दुर्भाग्यवश आज तक यह कैबिनेट में पास नहीं हुआ है तथा संसद में प्रस्तुत नहीं किया गया।
राजीव मिश्रा ने स्वयं The Ganga Protection Act 2025 का प्रारूप तैयार किया है, जो प्राइवेट बिल के रूप में संसद में प्रस्तुत करने योग्य है। इस प्रारूप की प्रति सत्याग्रह स्थल सूर घाट पर सभी के अवलोकन हेतु उपलब्ध है। वे संसद के सभी सदस्यों से अनुरोध कर रहे हैं कि इसे संसद में पेश करवाने हेतु सहयोग करें।
सरकार से प्रमुख माँगें:
क. भारत सरकार जल्द से जल्द गंगा एक्ट को कैबिनेट में पास कर संसद में प्रस्तुत करे अथवा राजीव मिश्रा द्वारा ड्राफ्ट किया The Ganga Protection Act 2025 को लागू करें.
ख. गंगा एवं सहायक नदियों में सिंचाई, जल विद्युत, घरेलू एवं औद्योगिक उपयोग हेतु चल रही परियोजनाओं एवं संरचनाओं से नदी के प्राकृतिक प्रवाह को पुनःस्थापित किया जाए। नदी के सतही एवं उपसतही जल के बीच समग्र संबंध बहाल हो, खोई प्राकृतिक वनस्पति पुनः स्थापित हो तथा निरंतर निर्मल प्रवाह में कोई बाधा न रहे।
ग. राजा भगीरथ द्वारा भगवान शिव की जटाओं से माँ गंगा को धरती पर लाते समय उनके दिव्य रथ के अनुसरण में गंगा का अविरल प्रवाह हुआ था; इस पौराणिक कथा को प्रतीक मानकर भागीरथी से गंगासागर तक गंगा के दोनों तटों पर एक संरक्षित जैविक एवं प्राकृतिक कोरिडोर (बफर ज़ोन) स्थापित किया जाए, जिसमें न्यूनतम चौड़ाई रथ के प्रतीकात्मक दायरे (लगभग 5-10 मीटर प्रत्येक तट से) को आधार बनाकर निर्धारित हो, ताकि माँ गंगा का अविरल और निर्मल प्रवाह सदैव बना रहे, सतही-उपसतही जल संबंध बहाल हो, कोई निर्माण/अतिक्रमण/बाँध/डायवर्जन प्रतिबंधित रहे, खोई वनस्पति-जैव विविधता पुनर्स्थापित हो तथा पारिस्थितिकी अक्षुण्ण बनी रहे—यह प्रस्ताव "गंगा एक्ट" में शामिल कर पौराणिक गरिमा के साथ आधुनिक संरक्षण सुनिश्चित किया जाए, जिससे गंगा प्रदूषण-मुक्त एवं प्राचीन अविरलता-पवित्रता युक्त हो।
हम सभी से अपील करते हैं कि इस राष्ट्रीय महत्व के अभियान में सहभागिता करें तथा सरकार पर दबाव बनाएँ ताकि माँ गंगा एवं उनकी सहायक नदियाँ पुनः अपनी प्राचीन गरिमा प्राप्त कर सकें।