विस्थापन के 15 वर्ष : विभाजन की विभीषिका से स्मृति, संघर्ष और संकल्प तक -  प्रो. नीलम कुमारी

विस्थापन के 15 वर्ष : विभाजन की विभीषिका से स्मृति, संघर्ष और संकल्प तक -  प्रो. नीलम कुमारी

भारत की स्वतंत्रता का इतिहास केवल विजय उत्सव और राष्ट्र निर्माण की गाथा नहीं है इसके पन्नों में एक ऐसा अध्याय भी दर्ज है जिसमें करोड़ों मनुष्यों की चीख, बिछड़ते हुए परिवार की विवशता, उजड़ते घरों की राख और लाखों लोगों के सपनों के टूटने की पीड़ा समाई हुई है । 1947 का भारत विभाजन केवल भूगोल का विभाजन नहीं था वह मनुष्य ,परिवारों की स्मृतियो, संस्कृतियों और सदियों पुराने सामाजिक संबंधों का भी विभाजन था । आज विस्थापन के 79 वर्ष बाद भी उस त्रासदी की स्मृतियां हमारे सामूहिक मानस में जीवित है।

14 अगस्त का दिन भारतीय इतिहास में केवल एक तिथि नहीं, बल्कि उस असहनीय पीड़ा की स्मृति है, जब स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय उपमहाद्वीप ने मानव इतिहास के सबसे बड़े और सबसे त्रासद जन-विस्थापन को देखा। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस उन लाखों लोगों की स्मृति को समर्पित है, जिन्होंने अपने घर, खेत, दुकान, गांव, शहर, स्मृतियाँ और कभी-कभी अपने प्रियजन तक खो दिए। यह दिन हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता का सूर्योदय लाखों परिवारों के लिए आँसुओं और रक्त की लालिमा के बीच हुआ था।

1947 में ब्रिटिश भारत का विभाजन हुआ और भारत तथा पाकिस्तान दो स्वतंत्र राष्ट्र अस्तित्व में आए। पंजाब और बंगाल का विभाजन विशेष रूप से भयावह सिद्ध हुआ। सर सिरिल रैडक्लिफ के नेतृत्व में खींची गई सीमा ने उन क्षेत्रों को बाँट दिया, जहाँ सदियों से विभिन्न समुदाय साथ रहते आए थे। विभाजन की घोषणा और सीमा निर्धारण के बीच की अनिश्चितता ने भय और अव्यवस्था को और बढ़ा दिया।

- विभिन्न ऐतिहासिक आकलनों के अनुसार लगभग 1.4 करोड़ से 2 करोड़ लोग विस्थापित हुए।
- विभाजन के दौरान हिंसा, बीमारी, भूख और अव्यवस्था के कारण लगभग 2 लाख से 10 लाख या उससे अधिक लोगों की मृत्यु के अनुमान मिलते हैं।
- पंजाब और बंगाल विभाजन से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में रहे।
- लाखों परिवारों ने अपने पुश्तैनी घर छोड़े और शरणार्थी शिविरों में जीवन आरंभ किया।
- केवल सिंधी हिंदुओं के संदर्भ में, 1948 के पहले छह महीनों में लगभग 10 लाख लोग भारत आए, जबकि सिंध में लगभग 4 लाख हिंदू रह गए थे; अगले वर्षों में यह संख्या भी तेजी से घटती गई।

इतिहासकारों के बीच इन आँकड़ों में अंतर है, क्योंकि उस समय विस्थापन और मृत्यु का कोई पूर्ण एवं विश्वसनीय आधिकारिक अभिलेख तैयार नहीं हो सका था। यही कारण है कि विभाजन की वास्तविक मानवीय कीमत शायद आज भी पूरी तरह आँकी नहीं जा सकी है। विभाजन की सबसे भयावह स्मृतियों में वे रेलगाड़ियाँ हैं, जो यात्रियों से भरी हुई चलती थीं और कभी-कभी गंतव्य तक पहुँचते-पहुँचते शोक की गाड़ियों में बदल जाती थीं।

एक मां थी जिसने अपने बच्चों को खोया था, एक बच्चा था जिससे अपने माता-पिता को पुकारते पुकारते बचपन खो दिया ,एक पिता था जिसने अपने जीवन की कमाई पीछे छोड़ दी, एक बेटी थी जिसे अपना घर और अपना संसार खो दिया  विस्थापन का सबसे बड़ा दर्द केवल घर छोड़ना नहीं था ,सबसे बड़ी पीड़ा थी यह जानना कि शायद अब उसे घर में कभी लौटना संभव नहीं होगा। वह आंगन जहां बचपन बीता था। वह नीम का पेड़ जिसके नीचे पीढियां बैठी थी ।वह कुआं जिससे परिवार पानी भरता था वह मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारा जहां पीढियो की आस्था जुडी थी। सब कुछ अचानक एक सीमा के दूसरी ओर चला गया। जिसे सहन कर पाना आसान नहीं था। लोग अपने साथ क्या लेकर चले गए 

कुछ कपड़े ,कुछ आभूषण, कुछ कागज, कुछ तस्वीरें, और सबसे अधिक अपनी स्मृतियां कई परिवारों के लिए एक पुरानी तस्वीर, एक चाबी ,एक खत या जमीन का कोई दस्तावेज उस घर की अंतिम निशानी बन गया जिससे वह कभी देख नहीं सके इसलिए विभाजन की स्मृति इतिहास की पुस्तकों में ही नहीं मिलती वह आज भी उन पुराने संदूको में मिलती है ,जिन्हें परिवारों ने पीढ़ियों से संभाल कर रखा है। वह बूढ़ी आंखों में मिलती है ।वह उन कहानियों में मिलती है जिन्हें दादा -दादी, नाना- नानी ने अपने बच्चों को पोती- पोते को सुनाया है। यह विभाजन मात्र एक दो या 15 वर्ष का नहीं है बल्कि संपूर्ण जीवन का है जिसमें विस्थापन ने पूरे जीवन और संसार को बदल दिया जिनकी स्मृतियां आज भी टीस बनकर  सीने में उभरती है। इसलिए देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने बिल्कुल सही कहा है कि 
"बंटवारे के दर्द को कभी बुलाया नहीं जा सकता ।

विभाजन की त्रासदी में महिलाओं की पीड़ा विशेष रूप से हृदयविदारक थी। हिंसा, अपहरण, बलात्कार, जबरन धर्म परिवर्तन और परिवारों से बिछड़ने की असंख्य घटनाएँ इतिहास के पन्नों पर दर्ज हैं। Partition Museum के अभिलेखों और मौखिक इतिहासों में ऐसी अनेक मानवीय कहानियाँ संरक्षित हैं।

परंतु इन महिलाओं की पीड़ा केवल 1947 तक सीमित नहीं रही। अनेक स्त्रियाँ जीवनभर उस मानसिक आघात को ढोती रहीं। उनकी कहानियाँ अक्सर परिवार की ‘इज्जत’ के नाम पर दबा दी गईं। इसलिए विभाजन की स्मृति को पूर्णता से समझने के लिए उन स्त्रियों की आवाज सुनना भी आवश्यक है, जिनकी पीड़ा इतिहास के आधिकारिक दस्तावेजों में बहुत कम दिखाई देती है।

विभाजन ने लाखों लोगों को शून्य से जीवन शुरू करने के लिए विवश किया।
जैसे
 1.विस्थापन के बाद पुनर्वास की चुनौती सामनेआयी करोडो विस्थापितों को घर, भोजन, वस्त्र और रोजगार उपलब्ध कराना सरकार के सामने एक विशाल चुनौती थी
 2. संपत्ति का प्रश्न
 जो लोग पाकिस्तान में अपनी जमीन मकान दुकान और व्यवसाय छोड़कर आए उनके पुनर्वास और संपत्ति के दावों का समाधान करने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा .।
 3 .सामाजिक अविश्वास विभाजन की इंसान ने विभिन्न समुदायों के बीच गहरे अविश्वास को जन्म दिया । सदियों पुराने पड़ोसी अचानक एक दूसरे से दूर हो गए और एक दूसरे के शत्रु भी हो गए । 
4. प्रशासनिक और आर्थिक विभाजन . सैन्य सरकारी संस्था रेलवे वित्तीय संसाधनों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बंटवारे  में नवगठित दोनों देशों के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी 
5. कश्मीर का प्रश्न विभाजन की विरासत में जम्मू कश्मीर का प्रश्न भी सामने आया जिसने भारत-पाकिस्तान के संबंधों को लंबे समय तक प्रभावित किया लेकिन भारत की मिट्टी ने इन विस्थापितों को केवल आश्रय ही नहीं दिया उन्हें अवसर भी दिया।

शरणार्थी शिविरों से निकलकर लोगों ने दुकानें खोलीं, उद्योग स्थापित किए, शिक्षा संस्थान बनाए, खेती की, साहित्य रचा और नए शहरों को आकार दिया। दिल्ली, अमृतसर, लुधियाना, जालंधर और अनेक अन्य शहरों के सामाजिक-आर्थिक जीवन पर विस्थापित समुदायों का गहरा प्रभाव पड़ा।

यह कहानी केवल पीड़ा की नहीं, अदम्य मानवीय जिजीविषा की भी कहानी है। जिस व्यक्ति के पास कल अपना घर नहीं था, उसने आज घर बनाए। जिसके पास दुकान नहीं थी, उसने बाजार खड़े किए।
जिसके पास जमीन नहीं थी, उसने अपने श्रम से नई जमीन तैयार की।
जिसके पास कुछ नहीं बचा था, उसने अपने बच्चों के लिए भविष्य बचाया।

एक पुराना संदूक, एक राशन कार्ड, एक चिट्ठी, घर की चाबी या किसी पुराने मकान की तस्वीर,ये वस्तुएँ साधारण दिखाई दे सकती हैं, लेकिन विस्थापित परिवारों के लिए ये पूरे जीवन की स्मृतियों के दस्तावेज हैं।
इसलिए स्मृति दिवस केवल अतीत को याद करने का दिन नहीं है; यह आने वाली पीढ़ियों को इतिहास से सीख देने का अवसर भी है।
विभाजन हमें सबसे बड़ी सीख देता है घृणा की राजनीति का अंतिम परिणाम मनुष्य की हार है।

धर्म, भाषा, जाति, क्षेत्र या विचारधारा के आधार पर मनुष्य को मनुष्य से अलग करना आसान है; लेकिन उस विभाजन की कीमत पीढ़ियाँ चुकाती हैं।