विकसित भारत’ की कल्पना: अटल जी का स्वप्न - गोपाल कृष्ण अग्रवाल

विकसित भारत’ की कल्पना: अटल जी का स्वप्न - गोपाल कृष्ण अग्रवाल

भारतीय राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी जी एक ऐसे ध्रुवतारे थे, जिनकी चमक ने न केवल भाजपा को गढ़ा, बल्कि आधुनिक भारत की नियति को भी एक नई दिशा दी। उनकी राजनीति सत्ता की नहीं, संस्कारों की थी, जहां अंत्योदय केवल नारा नहीं, बल्कि शासन का मूलमंत्र था। आज जब पूरा देश उनकी 101वीं जयंती मना रहा है, तो यह केवल एक नेता का स्मरण नहीं, बल्कि 'अटल विजन' का उत्सव है। अटल बिहारी वाजपेयी जी ने राजनीति में मर्यादा और शासन में संवेदनशीलता का जो मानक स्थापित किया, वह आज भी भाजपा का मार्गदर्शक सिद्धांत है। कवि हृदय अटल जी की पंक्तियां आज भी भारत की आत्मा से संवाद करती हैं “हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं।” आज भी यह शब्द भारतीय लोकतंत्र की जिजीविषा और सुशासन का मंत्र बने हुए हैं।। अटल जी का मर्यादित सुशासन कांग्रेसी कार्यसंस्कृति पर सबसे प्रखर प्रहार था, जिसने दशकों तक देश को 'नीतिगत अपंगता', भ्रष्टाचार और तुष्टीकरण के अंधेरे में धकेले रखा। जहां कांग्रेस के दौर में सत्ता एक परिवार की परिक्रमा और बिचौलियों का चारागाह बन चुकी थी, वहीं अटल जी ने भाजपा की विचारधारा के अनुरूप राष्ट्रनीति को 'परिवारवाद' के साए से मुक्त कर जनता के प्रति जवाबदेह बनाया। कांग्रेस ने जिस अनुच्छेद 370 को वोट बैंक की ढाल बनाकर देश की अखंडता से खिलवाड़ किया, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने उसे जड़ से उखाड़कर अटल जी के 'अखंड भारत' के स्वप्न को आज धरातल पर उतारा है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत जब अमृतकाल की ओर अग्रसर है, तब अटल जी का सुशासन मॉडल पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। 25 दिसंबर भारतीय लोकतंत्र के कैलेंडर में सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि विचार, विवेक और व्यवस्था का प्रतीक है। उनकी स्मृति में मनाया जाने वाला सुशासन दिवस उस राजनीतिक संस्कृति का पुनःस्मरण है, जहां नीति, नैतिकता और राष्ट्रहित एक-दूसरे के पूरक थे। उनकी जयंती के 101वें वर्ष में, भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में देश ‘विकसित भारत’ की ओर बढ़ते हुए अटल बिहारी वाजपेयी जी के सपनों को साकार कर, उन्हें कर्म और संकल्प के माध्यम से अपनी सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है।
 
अंत्योदय से सुशासन तक का सफर

वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने 25 दिसंबर को 'सुशासन दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय कर देश को याद दिलाया कि शासन तब तक सार्थक नहीं है जब तक वह पारदर्शी और लोक-कल्याणकारी न हो। सुशासन का नाम इसे इसलिए दिया गया क्योंकि यह 'गुड गवर्नेंस' का भारतीय संस्करण है जहां सरकार जनता की स्वामी नहीं, बल्कि सेवक है। अटल जी ने राजनीति के उस युग की शुरुआत की जहां विकास ही एकमात्र पैमाना बन गया। अटल बिहारी वाजपेयी जी ने कहा था कि “सरकारें आएंगी-जाएंगी, लेकिन यह देश रहना चाहिए।” उनका यह कथन आज केवल स्मरण नहीं, बल्कि नीति और व्यवहार का आधार बन गया है। सुशासन दिवस हमें यह सिखाता है कि राष्ट्रहित राजनीति से ऊपर होता है। वाजपेयी सरकार ने अपने कार्यकाल में कई ऐसे ऐतिहासिक और साहसिक निर्णय लिए, जिन्होंने न केवल भारत का भाग्य बदला, बल्कि विकास की एक ऐसी तस्वीर पेश की जिसकी चमक आज भी बरकरार है। परमाणु शक्ति से लेकर ग्रामीण सड़कों के जाल तक, उनके हर निर्णय में राष्ट्र निर्माण का स्वर था। जहां एक ओर अटल जी ने 'अंत्योदय अन्न योजना' के जरिए दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम शुरू किया, ताकि कोई गरीब भूखा न सोए। वहीं दूसरी ओर सामरिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए 'अटल टनल' की नींव रखी और अंतरिक्ष में भारत की धमक बढ़ाने के लिए 'चंद्रयान मिशन' की घोषणा की। दिल्ली मेट्रो का शुभारंभ कर शहरी परिवहन की तस्वीर बदली, तो 'लुक ईस्ट पॉलिसी' और पूर्वोत्तर के लिए अलग मंत्रालय बनाकर देश के इस उपेक्षित हिस्से को मुख्यधारा से जोड़ा। इतना ही नहीं, संचार के क्षेत्र में 'नई टेलीकॉम नीति' के जरिए मोबाइल को लग्जरी वस्तु से हटाकर हर हाथ की जरूरत बना दिया। उनके यह सभी निर्णय बताते हैं कि अटल जी केवल तात्कालिक राजनीति नहीं, बल्कि भारत के उज्जवल भविष्य का खाका खींच रहे थे।  
 
अटल जी का व्यक्तित्व

अटल जी का व्यक्तित्व बहुत विशाल था. उन्हें भारतीय राजनीति का अजातशत्रु माना जाता है. उन्हें हर राजनीतिक पार्टी और नेताओं का सम्मान प्राप्त था और पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी और नरसिम्हा राव जी के साथ उनके मधुर सम्बंध थे. विपक्ष में होने के बावजूद वे देशहित में सत्ता पक्ष के साथ हमेशा खड़े रहें। नेहरु जी ने तो तो उन्हें भविष्य का प्रधानमंत्री तक कहा। इंदिरा जी ने संयुक्त राष्ट्र में विपक्षी नेता होने के बावजूद भारत का पक्ष रखनें के लिए भेजा। और नरसिम्हा राव जी ने जब अटल जी प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तो अपनी और लिख कर दिया, जो कार्य वे करना चाहते थे और नहीं कर पाये।
 
टीवी पत्रकार रजत शर्मा ने एक बार अटल जी से कहा था कि उन्हें अटल जी से भाषण की कला सीखनी है, तो अटल जी ने कहा, "मुझसे सीखना है तो चुप रहने की कला सीखो"। अटल जी का यह कहना था कि बोलने से ज़्यादा ज़रूरी है कि कब चुप रहना है, और यह सबक जीवन भर काम आता है।

विरासत का विस्तार: वाजपेयी के सपनों को मोदी युग ने लगाए पंख

अटल जी ने जिस 'नए भारत' का खाका खींचा था, उसे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी धरातल पर उतार रहे हैं। अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण कर करोड़ों लोगों की आस्था को न्याय दिलाया। अटल जी की 'डिजिटल कनेक्टिविटी' की सोच आज 'डिजिटल इंडिया' के रूप में विश्व का नेतृत्व कर रही है। अटल जी ने कहा था "अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा।" उनके इस विश्वास को मोदी जी ने 'विकसित भारत' के संकल्प में बदल दिया है। आज 'अटल कैंटीन' के माध्यम से गरीबों को सस्ता भोजन मिल रहा है, जबकि 'अटल भूजल योजना' और 'अटल पेंशन योजना' उनके सामाजिक सुरक्षा के सपने को साकार कर रही हैं। भाजपा आज अटल जी की विचारधारा को केवल भाषणों में नहीं, बल्कि नीतियों में भी आगे बढ़ा रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने बुनियादी ढांचे को राष्ट्र निर्माण का आधार बनाया, अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक योजनाओं की सीधी पहुंच सुनिश्चित की और निर्णय लेने में साहस और स्पष्टता दिखाई। यह वही सपना है जो अटल जी देखते थे मजबूत भारत, सक्षम भारत का। आज भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जो अटल जी के सपने को वैश्विक मंच पर सिद्ध कर रही है। 'विकसित भारत 2047' का संकल्प अटल जी की विचारधारा का विस्तार है। यह यात्रा नीति से नियत तक, शासन से सुशासन तक और सपना से सिद्धि तक की यात्रा है। अटल जी ने जिस 'सुशासन' की लौ जलाई थी, आज वह 'विकसित भारत' के संकल्प का सूर्य बनकर चमक रही है। सुशासन दिवस केवल अटल बिहारी वाजपेयी जी को याद करने का दिन नहीं, बल्कि उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प है। सुशासन अब फाइलों के बोझ में नहीं, बल्कि लाभार्थियों के चेहरों की मुस्कान में दिखता है। आइए, सुशासन के इस उत्सव को केवल एक दिवस न रहने दें, बल्कि इसे राष्ट्र-निर्माण का एक अनवरत स्वभाव बनाएं, क्योंकि जब शासन सुशासन बनता है, तभी राष्ट्र का भाग्य बदलता है। 25 दिसंबर का यह दिन हमें याद दिलाता है कि सरकार केवल चलाने के लिए नहीं, बल्कि देश की तस्वीर बदलने के लिए होती है। सुशासन की यह विरासत, जो अटल जी से मोदी जी तक प्रवाहित हो रही है, आधुनिक भारत के लिए एक ऐसा रक्षा कवच है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक 'स्वर्णिम युग' का मार्ग प्रशस्त करेगा।

साभार : गोपाल कृष्ण अग्रवाल - राष्ट्रीय प्रवक्ता भाजपा