आखिर क्यों चुनाव आते ही राजनैतिक दलों को याद आते हैं पुर्व चेयरमैन अरुण सिंह
गाजीपुर की राजनीति में 1999 से भारतीय जनता पार्टी में एक सक्रिय राजनीति करके जनपद में नेताजी के नाम से सुप्रसिद्ध जिला सहकारी बैंक के पूर्व अध्यक्ष के चौखट पर पहुंच रहे हैं भाजपा बसपा के लोकसभा प्रत्याशी और समर्थक मौका मिलते ही उक्त अवसर पर अपना उपस्थिति दर्ज कराना तक नहीं भूल रहे हैं कई राजनीतिक दल के माननीयों के द्वारा बीते दिनों अरुण सिंह की पत्नी शीला सिंह जिनका लखनऊ स्थित एक निजी अस्पताल में इलाज चल रहा था उनके घर आने के बाद पूछाहार करने के लिए बसपा प्रत्याशी उमेश सिंह और भाजपा के युवा मोर्चा के पदाधिकारी के द्वारा पहुंचने पर चर्चाएं तेज हो गई है पार्टी से बागी होकर जनपद की राजनीति के लिए एक नए संगठन का निर्माण कर अपने चहेतो को एक मंच देकर अरुण सिंह ने अपने कद को और मजबूत कर लिया है जिसके कारण नगर पालिका का चुनाव हो या विधान परिषद का चुनाव हो या अब लोकसभा का चुनाव राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों के समर्थक और प्रत्याशी अरुण सिंह की चौखट पर पहुंचने में गुरेज नहीं करते वही इस मामले पर अरुण सिंह ने बताया कि मेरे द्वारा अभी तक पत्ता नहीं खोला गया है मेरे अपनों के साथ बैठक की जाएगी उनके राय मसौरे के बाद ही हम निर्णय ले सकेंगे की लोकसभा के चुनाव में किस पहलुओं पर मतदान करना है।
जाने अरूण सिंह का राजनैतिक सफर
अरुण सिंह ने सन 1999 में भाजपा की सदस्यता तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष बने राजनाथ सिंह के उपस्थिति में नागा बाबा धाम करंडा में लिया था उसके पहले वह कांग्रेस पार्टी में उत्तर प्रदेश के संयुक्त सचिव रहे, उस समय जिला सहकारी बैंक गाज़ीपुर का निर्वाचित डायरेक्टर तथा जिला पंचायत सदस्य निर्वाचित हुए थे ।सन 2000 में जिला सहकारी बैंक गाज़ीपुर का उत्तर प्रदेश शासन द्वारा प्रशासक नियुक्त किया गया क्योंकि भाजपा का कोई भी डायरेक्टर जिला सहकारी बैंक का था ही नहीं, अरुण सिंह एक मात्र डायरेक्टर थे। उस समय उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे। सन 2000 में सहकारिता चुनाव में जिला सहकारी बैंक गाज़ीपुर का निर्वाचित अध्यक्ष बने ।सन 2002 में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर जमानिया से तथा 2007 में भी जमानिया से और सन 2012 में गाजीपुर सदर से भाजपा विधान सभा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े । 2014 में लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी से इस्तीफा दिया लेकिन आज तक इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया और फिर उन्होने निर्दल लोकसभा का चुनाव भी लड़ा ।सन 2015 में सर्वदलीय संघर्ष समिति का संयोजक बन कर आज तक इसी बैनर के तले संघर्ष कर रहा हैं।


