हिंदी को संस्कार और शिक्षा से जोड़ने की पहल: शालिनी सिंह का 'कविता चली स्कूल’ अभियान
हिंदी हमारी मात्र भाषा नहीं, हमारी संस्कृति, हमारी आत्मा और हमारे संस्कारों की पहचान है। जब चीन, जापान और यूरोप के देश अपनी भाषा पर गर्व करते हैं, तो हमें अपनी हिंदी बोलने में संकोच क्यों?
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का विकसित भारत 2047 का सपना तभी साकार होगा, जब हम अपनी जड़ों की ओर लौटेंगे—अपनी मातृभाषा को अपनाएँगे और उस पर गर्व करेंगे।
शालिनी सिंह, जो स्वयं एक कवयित्री हैं, हिंदी के महत्व को गहराई से समझती हैं। उनका मानना है कि हिंदी में ऐसे असंख्य सुंदर और भावनात्मक शब्द हैं, जो आज की पीढ़ी की आम बोलचाल से धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। आज के बच्चों और युवाओं की हिंदी शब्दावली कमज़ोर हो रही है—और यही चिंता उन्हें कर्मभूमि की ओर ले जाती है।
इसी उद्देश्य से, इंदिरापुरम स्कूल की प्रेसिडेंट के रूप में, शालिनी सिंह ‘कविता चली स्कूल’ जैसे अभिनव कार्यक्रम की शुरुआत कर रही हैं। पद्मश्री सुनील जोगी जी के मार्गदर्शन में, स्कूलों में देश के बड़े कवियों की कविताएँ बच्चों तक पहुँचेंगी और बच्चों को कविता लिखने, भाव व्यक्त करने, वाक्यपटुता और वक्तृत्व की कला सिखाई जाएगी।
इतिहास गवाह है—कविताओं ने आंदोलन खड़े किए हैं। फिर हम अपने बच्चों को इस शक्ति से वंचित क्यों रखें? क्या पता, कोई एक कविता किसी बच्चे के हृदय को छू जाए और वही बच्चा कल का कलाम या मोदी बनकर देश का गौरव बढ़ाए।
हिंदी प्रेम उनके जीवन में सिर्फ विचार नहीं, भाव है। इसका प्रमाण तब मिला जब पिता माननीय ब्रिजभूषण शरण सिंह जी के जन्मदिन पर शालिनी सिंह ने उन्हें कविता लिखकर भेंट दी— “पापा आप हमारी शान हैं, प्राण हैं, अभिमान हैं। पापा आप हमारी हर ख़ुशी की पहली पहचान हैं। बच्चे आपके देख कर जीते हैं आपको, आपका हर आदेश हमारे लिए विधि का विधान है।”
संस्कारों से सीखी भाषा, भाषा से सीखा स्वाभिमान—यही परंपरा शालिनी सिंह आगे बढ़ा रही हैं।


