जल प्रबंधन की अभिनव रणनीतियाँ से सतत विकास को गति’ पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन
एमिटी विश्वविद्यालय के नैचुरल रिर्सोसेस एंड एनवायरमेंटल सांइसेस डोमेन द्वारा विश्व जल दिवस पर छात्रों के लिए सतत जल प्रबंधन, जल और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने के लिए ‘‘जल प्रबंधन की अभिनव रणनीतियाँ से सतत विकास को गति’’ पर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला का शुभारंभ भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के वैज्ञानिक श्री सुंदीप, एमिटी इंस्टीटयूट ऑफ एनवांयरमेंटल सांइसेस के मागदर्शक प्रो डी के बंद्योपाध्याय, भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के वैज्ञानिक और सलाहकार डा जगवीर सिंह, एमिटी विश्वविद्यालय के नैचुरल रिर्सोसेस एंड एनवायरमेंटल सांइसेस डोमेन के प्रमुख प्रो एस पी सिंह और एमिटी इंस्टीटयूट ऑफ एनवांयरमेंटल सांइसेस की सहायक निदेशक डा रेनू धुप्पर द्वारा किया गया।
कार्यशाला का शुभारंभ करते हुए भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के वैज्ञानिक श्री सुंदीप ने कहा कि जल प्रबंधन के क्षेत्र में आ रही चुनौतियों को समझे और इसका निराकरण करे। हमारी जल प्रबंधन के पांरपरिक प्रणाली काफी प्रभावी थी किंतु बदलते समय में हमने उनका उपयोग कम करते हुए आज उनका उपयोग बंद कर दिया है और आज हम आपूर्ति औरं मांग की चुनौतियों से जुझ रहे है। श्री सुंदीप ने कहा कि सतत विकास के लिए जल प्रबंधन आवश्यक है और नेपथ्य में अनुसंधान व नवाचार प्रर्याप्त नही है हमें मिलकर साझा प्रयास करना होगा। चुनौतियों से निपटने के लिए किफायती तकनीक का उपयोग करना होगा और आवश्यकता क्या है एंव हम क्या चाहते है के मध्य के अंतर को भी समझना होगा। स्पोक एंव हब मॉडल अधिक प्रभावी होगे।
एमिटी इंस्टीटयूट ऑफ एनवांयरमेंटल सांइसेस के मागदर्शक प्रो डी के बंद्योपाध्याय ने कहा कि अगर एक बड़ी जनसंख्या को स्वच्छ जल उपलब्ध नही हो रहा तो क्या हम विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल कर पायेगे। पृथ्वी पर अधिकतर जल दूषित हो चुका है, वाटर क्वालिटी इंडेक्स में 122 देशों में भारत 120वें स्थान पर है। सुरक्षित पेयजल तक सार्वभौमिक पहुँच और जल की गुणवत्ता में सुधार, जल संसाधनो का विकास और उनका सतत उपयोग, मजबूत और प्रभावी जल प्रशासन, जल की गुणवत्ता का विकास एवं अपशिष्ट जल प्रबंधन आदि सभी के लिए सतत विकास जल सुनिश्चित करता है। इस दौरान उन्होनें सिंचाई प्रबंधन, वाटरशेड प्रबंधन, वेटलैंड संरक्षण, ईटीपी की स्थापना, समुदायिक सहयोग आदि के संर्दभ में विस्तृत जानकारी प्रदान की।
भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के वैज्ञानिक और सलाहकार डा जगवीर सिंह ने कहा कि हर जल की बूंद महत्वपूर्ण है। प्राचीन समय से हमारे वेदो और उपनिषदों में जल संरक्षण के महत्व को बताया गया है। हमें अनुसंधान व नवाचार में अंतःविषयक ज्ञान के साथ छात्रों को प्रयोगिक अनुभव के अवसर प्रदान करने होगे। हमारा देश तीन ओर से समुद्र से घिरा है, मीठे जल के स्त्रोत कम हो रहे है इसलिए यही वक्त है कि प्राकृतिक संसाधनो का अधिक से अधिक संरक्षण किया जाये। हमें संरक्षण के बेहतरीन प्रयासों को अपनाना होगा जिससे सभी चुनौतियों का निवारण किया जा सके। इस प्रकार की कार्यशाला छात्रों को व्यवसायिक जीवन में विकास करने के लिए सहायता प्रदान करेगी।
एमिटी विश्वविद्यालय के नैचुरल रिर्सोसेस एंड एनवायरमेंटल सांइसेस डोमेन के प्रमुख प्रो एस पी सिंह ने कहा सभी लोग जल प्रदूषण, जल संसाधनों की कमी आदि समस्याओं को जानते है किंतु समस्या के निवारण हेतु प्रयास कम हो रहा है। जल संकट कई अन्य समस्याओं को जन्म दे रहा है। एमिटी में आयोजित इस कार्यशाला का उददेश्य प्रतिभागीयों में सतत जल प्रबंधन पद्धतियों के प्रति जागरूकता फैलाना है।
एमिटी इंस्टीटयूट ऑफ एनवांयरमेंटल सांइसेस की सहायक निदेशक डा रेनू धुप्पर ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि इस कार्यशाला के जरीए जल संरक्षण से संबंधित ज्ञान और अभिनव रणनीतियों को साझा करने का एक मंच प्रदान किया गया जिससे शैक्षणिक संस्थानों, उद्योगों और नीतिगत संस्थाओं के बीच सहयोग को सुदृढ़ बनाया जा सके। उभरती पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए उद्योग और शिक्षा जगत के बीच परस्पर संवाद को बढ़ावा दिया गया।
इस कार्यशाला के अंर्तगत आयोजित तकनीकी सत्र में कोर्टेवा एग्रीसाइंस की कॉटन इंसेक्टीसाइड स्ट्रैटजी लीड सुश्री शबनम हुसैन, आईपी विश्वविद्यालय की प्रो अंशु गुप्ता और नई दिल्ली के केन्द्रीय जल आयोग के वैज्ञानिक डा संदीप कुमार शुक्ला ने अपने विचार रखे।
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