राज्य सरकार की दोषपूर्ण नीतियाँ राष्ट्रीय विकास एजेंडा को पटरी से उतार सकती है - विजय सरदाना

दिल्ली।PNI News। केंद्र सरकार, भारत के प्रधानमंत्री, संसद के माध्यम से किसानों की आय दोगुना करने के लिए कड़ी मेहतन कर रहे है। तीनो कृषि व्यापार कानून, कृषि प्रसंस्करण इकाइयों को प्रोत्साहित करके बेहतर बाजारों का पता लगाने के लिए और किसानों के लिए रोज़गार अवसर का सृजन करने वाला है। वर्तमान में हम 70% घरेलू खाद्य तेल की आपूर्ति के लिए आयातित तेल पर निर्भर है| भारत सरकार खाद्य तेल क्षेत्र का उपयोग करके इस अंतर को पाटने के लिए, किसानों की आय में सुधार करने, किसानों के लिए बेहतर आय स्त्रोत और भारत के समग्र ग्रामीण विकास के लिए रोज़गार सृजन और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में सुधार करने के लिए एक महत्वाकांक्षी तिलहन मिशन पर काम कर रही है और "मेक-इन-इंडिया" को बढ़ावा देकर राजस्व सृजन में सुधार कर रही है।

क्यों राज्य सरकारें, राष्ट्रीय एजेंडे के साथ गठबंधन नहीं करती है?
इस बात को उदाहरण के साथ शुरू करते है, आद्यौगिक प्रोत्साहन नीति 2014, मध्यप्रदेश सरकार की अनुबंध-बी में क्रम संख्या 13 पर किसी भी प्रकार के समर्थन और प्रोत्साहन के लिए अयोग्य उद्योगों की सूची पर प्रकाश डाला गया है,जिसमें खाद्य तेल का शोधन (स्वतंत्र इकाई) और सोयाबीन तेल उत्पादक इकाइयां (रिफाइनरी सहित) का उल्लेख है। इसका मतलब है कि सोयाबीन प्रोसेसिंग निवेश योग्य नहीं है और राज्य की औद्योगिक नीति के तहत प्रावधानित प्रोत्साहन के हक़दार है। यह एक बहुत ही प्रतिगामी और अतार्किक कदम है| इसे तत्काल प्रभाव से बदलना होगा।
सीमेंट उद्योग के लिए ऐसा ही प्रावधान था लेकिन इसे GoMP क्रम संख्या एफ 16-18/2018/ए -11 दिनांक 28/08/2018 के अनुसार अयोग्य उद्योग की सूची से बदल दिया गया था, स्टैंड्स डिलीट किया गया है जिसका उल्लेख पॉइंट 14 में किया गया था- "सीमेंट (इन्क्लूडिंग क्लिंकर) मैन्युफैक्चरिंग"। इस नीति परिवर्तन ने मप्र राज्य को कई तरह से लाभान्वित किया जो रोज़गार, कर राजस्व और निवेश के आंकड़ों से दिखाई देता है।

यह राज्य नीति क्यों बदलनी चाहिए?
मध्य प्रदेश में सोयाबीन की खेती का सबसे बड़ा क्षेत्र है लेकिन कई अन्य राज्यों की तुलना में औसत उत्पादकता बहुत कम है। यह एक चिंता का विषय है क्योंकि ख़राब उत्पादकता का मतलब उत्पादन की अधिक लागत और राज्य में निवेश की कम सम्भावना। अब सोयाबीन प्रॉसेसिंग के लिए और नए निवेश के लिए समर्थन की कमी के साथ मध्यप्रदेश सरकार अपने किसानों और स्थानीय उद्योग को गंभीर संकट में डाल रही है क्योंकि केवल नए निवेशक तलाश करेंगे कि किसानों को उत्पादकता और बेहतर सेवा कैसे दी जाये| मौजूदा कंपनियों ने अपने कई प्रयासों के बाद अब प्रयास करना बंद कर दिया है और यही कारण है कि उत्पादकता स्थिर है जिससे उत्पादन की उच्च लागत और उपयोग की क्षमता कम होती है।
कमज़ोर निवेश से कमज़ोर उत्पादकता, कमज़ोर क़्वालिटी होगी, जो उपयोग की क्षमता को और कमज़ोर बनाती है जिससे किसानों की कम आय और राज्य सरकार को कम राजस्व प्राप्त होगा। मध्यप्रदेश में नीति बनाने वालो की सराहना करनी होगी कि पिछले दो दशक में सोयाबीन उत्पाद के प्रमुख खरीददार यानि पोल्ट्री उद्योग के क़्वालिटी स्टैण्डर्ड ग्लोबल स्टैण्डर्ड के अनुरूप है जो पोल्ट्री उद्योग में उत्पादन स्तर को पूरा करने के लिए आवश्यक है।
दुर्भाग्य से मध्यप्रदेश में सोयबीन प्रोसेसिंग उद्योगों द्वारा अपनाएं गए स्टैण्डर्ड पुराने है। यही कारण है कि मध्यप्रदेश सोयाबीन उद्योग उपयोग की कम क्षमता पर काम कर रहा है। अच्छी व्यवसायिक प्रैक्टिस को बढ़ावा देने और किसानों के लिए बेहतर कीमत वसूली के लिए, प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के लिए, राज्य की नीति नए निवेश के लिए बाधा बन रही है और पुरानी तकनीकों और ख़राब गुणवत्ता वाली कंपनियों को बचाने की कोशिश कर रही है और बाजार की गुणवत्ता की ज़रूरत को पूरा करने असमर्थ है।
यह देखकर हैरानी होती है कि आज भी मध्यप्रदेश से आने वाले कुछ लोग सोया मील जैसे खाद्य उत्पादों में 2% रेत और सिलिका की अनुमति देते हैं| यह चौकाने वाला है। यह केवल तभी संभव है जब कपनियां या तो पुरानी तकनीकों का उपयोग कर रही है या अनैतिक साधनों से लाभ वृद्धि के लिए प्रोसेसिंग के बाद उत्पाद में वजन जोड़ने के लिए मिलावट कर के रेत और सिलिका मिलाने का प्रयास जानबूझकर कर रही है। सोयाबीन मील में उच्च स्तर की अशुद्धियाँ आ सकती है इसका कोई दूसरा रास्ता नहीं है। यदि आवश्यक है तो मध्यप्रदेश सरकार यह जानने के लिए एक जाँच कर सकती है कि राज्य में सोयाबीन की गुणवत्ता इतनी ख़राब क्यों है?

पुरानी औद्योगिक नीति के अर्थ
मध्यप्रदेश राज्य की इस पुरानी और अतार्किक निवेश नीति के कारण नया निवेश महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों में जा रहा है। मध्यप्रदेश में सोयामील की ख़राब गुणवत्ता के कारण कई पोल्ट्री कम्पनियों ने बैकवर्ड इंटिग्रेशन में निवेश करना शुरू कर दिया है| मौजूदा सोयाबीन प्रोसेसिंग कम्पनियाँ से सोयाबीन ख़रीदने के बजाये वह स्वयं के सोयाबीन प्रोसेसिंग स्थापित कर रहे है और क़्वालिटी स्टैण्डर्ड को पूरा करने के लिए अच्छी क़्वालिटी वाले सोयाबीन मील्स बना रहे हैं। यह मध्यप्रदेश राज्य में राजस्व को नुक्सान पंहुचा रहा है साथ ही रोज़गार के नए सृजन और बेहतर प्रौद्योगिकी के आदान-प्रदान को प्रभावित कर रहा है। सोयाबीन प्रोसेसिंग में बड़े निवेश की कमी पैकेजिंग, ट्रांसपोर्टेशन, गोडाउन, फ़ीड उत्पादन को हतोत्साहित कर रही है।
नए निवेश की कमी और मौजूदा सह कम्पनियाँ के क्षमता के ख़राब उपयोग से मध्यप्रदेश के सोयाबीन किसानों को नुक्सान होगा| नए कृषि कानून अधिनियम मध्यप्रदेश के बाहर उन राज्यों में निवेश को बढ़ावा देंगे जो निवेशकों के लिए अनुकूल है।

मध्य प्रदेश के नीति निर्माताओं को क्या करना चाहिए?
सोयाबीन के लिए पुरानी औद्योगिक नीति सोयाबीन के पुराने उद्योगों और उद्योगपतियों को सुरक्षा दे रही जो अपनी पुरानी नीतियों और गुणवत्ता को अपग्रेड करने के लिए तैयार नहीं है। यह उनके सोयाबीन क्रेताओं को दूसरे राज्यों में जाने के लिए मजबूर कर रहा है। क्या यह राज्य और मध्यप्रदेश राज्य के किसानों के लिए उचित है?
मेरे सुझाव को प्रोत्साहित करना सोयाबीन प्रोसेसिंग में प्रतिस्पर्धा को बढ़ाएगा। ख़राब कंपनियों को नई कंपनियों के लिए व्यवसाय से बाहर जाना पड़ेगा। यह विकास और प्रगति का अनिवार्य हिस्सा है। यह मौजूदा कंपनियों के अपग्रेड होने और किसानों को उचित मूल्य की समझ के लिए प्रोत्साहित करेगा। "औद्योगिक प्रोत्साहन नीति 2014" से अनुलग्नक-B में उल्लेखित सोयबीन उद्योग को तत्काल अपात्र सूची से हटा दें।
मैं जानता हूँ कि कुछ मौजूदा उद्योग और उससे जुड़े लोग इसका विरोध करेंगे क्योंकि प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और क़्वालिटी बनाए रखने के लिए उनपर दबाव बढ़ेगा। लेकिन क्या राज्य को कुछ लोगों को खुश करने के लिए देश के विकास और आधुनिकीकरण को रोकना चाहिए?

यह समय बेहतर भविष्य बनाने के लिए नेतृत्व करने का है।