राज्य कर विभाग के अपर आयुक्त से मिला उद्यमी संगठन का प्रतिनिधि मंडल 

राज्य कर विभाग के अपर आयुक्त से मिला उद्यमी संगठन का प्रतिनिधि मंडल 

नव नियुक्त अपर आयुक्त का किया अभिनंदन और बताई समस्याएं

औद्योगिक संगठन एमएसएमई इंडस्ट्रियल एसोसिएशन नोएडा का प्रतिनिधि मण्डल राज्य वस्तु एवं सेवा कर विभाग के नौएडा जोन के एडीशनल कमिश्नर पद का कार्यभार ग्रहण करने पर उनका अभिनंदन करने सेक्टर 148 स्थित कार्यालय पहुंचे !

संस्था एमएसएमई इण्डस्ट्रीरियल एसोसिएशन, नौएडा जिला गौतमबुद्ध नगर की ओर से अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह नाहटा, महामंत्री शिव कुमार राणा, उपाध्यक्ष मेहंदी हसन नकवी, उपाध्यक्ष दिलशाद अहमद, सचिव सुबोध कुमार, दिलीप मिश्रा आदि पहुंचे और उनको निम्न समस्याओं से अवगत करवाया।

गौतमबुद्ध नगर जोन उप्र राज्य में एक औद्योगिक जिले के रुप मे जाना जाता है और राजस्व संग्रह की दृष्टि से प्रांत में अग्रगणि स्थान रखता है। यहॉ भिन्न-2 प्रकार की औद्योगिक इकाईया, जिनमें राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनिया, विभिन्न औद्योगिक समूह की इकाईयॉ शामिल है, स्थापित है। इन औद्योगिक इकाईयों, व्यापारिक फर्मो के स्वामियों से समन्वय स्थापित करते हुये और विभाग से सामन्जस्य स्थापित करते हुये अधिक से अधिक कर संग्रहण में अधिवक्ता वर्ग सदैव तत्पर रहतें हैं किन्तु नौएडा में कार्यालयों में कुछ अनावश्यक विधि विरुद अवरोध एवं समस्याओं का सामना व्यापारी एवं अधिवक्ता वर्ग को करना पड़ रहा है जिनको प्रतिनिधि मंडल ने अपर आयुक्त महोदय का घ्यान इस ओर आकृर्षित किया। 

यह कि विभाग प्रारम्भ से ही राज्य में अधिक से अधिक व्यापारियों को पंजीकृत कराने के हेतु कृत संकल्प रहा है एवं समय-2 पर पंजीयन कैम्प भी लगाये जातें रहें है तथा इसी क्रम में पंजीयन की इस प्रक्रिया को फेस लैस (चेहरा विहीन)  रखा गया है किन्तु नौएडा में पंजीयन हेतु आवेदन करने के पश्चात कोई न कोई आब्जैकशन लगाकर संबंधित व्यक्ति को कार्यालय में बुलाने का प्रयास किया जाता है जिससे एक ओर व्यापार शुरु करने हेतु लिये जा रहे पंजीयन में विलम्ब होता है तथा इसके साथ-2 भ्रष्टाचार को भी बढ़ाया मिलता है। पंजीयन लेने में जो क्वारीज रेज की जाती हैं उनके संबंध में भेट वार्ता के समय संक्षेप में महोदय के संज्ञान में लाया जायेगा।

प्रायः यह देखने में आया है कि नौएडा से इतनी अधिक दूरी पर जाने के पश्चात भी अधिकांश कार्यालयों में अधिकारी समय से कार्यालयों में नही पहुंच रहें हैं तथा काफी विलम्ब से आते है। इसके अतिरिक्त पहुंचने के पश्चात भी अधिकांश अधिकारी अपनी-2 सीटो पर नही मिलते है। अधिकारी वर्ग के बारे में सदा यही कहा जाता है कि मीटिंग में गये है और राज्य कर अधिकारियों के बारे में सदा यही कहा जाता है कि जॉच हेतु गये हैं। इन अधिकारियों के कार्यालय से बाहर जाने के संबंध में न तो कोई रजिस्टर आदि मेनटेन किया जाता है और न ही कोई संतोष जनक उत्तर संबंधित कार्यालयों से प्राप्त होता है। नौएडा, दिल्ली व गाजियाबाद से इतना लम्बा सफर तय करने के पश्चात भी संबंधित अधिकारी का सीट पर न मिलना, पत्रावली का न मिलना अथवा कोई संतोषजनक उत्तर न मिलने से अधिवक्ता उद्यमी-व्यापारी का समय भी खराब होता है और कार्य में रुकावट आती है। 

यह कि नौएडा में अपील की 3 यूनिट कार्यरत है जिनमें वादकारियों के लिये कोई समुचित व्यवस्था नही है। अपील में केस लगने का मतलब यह है कि आपका पूरा दिन अपील की भेंट होगा और उस दिन वाद की सुनवाई हो जाये, यह भी आवश्यक नही है क्योंकि क्षमता से अधिक वादों को सुनवाई के लिये नियत कर दिया जाता है और अधिवक्ता वर्ग का पूरा समय अपना नम्बर आने के इन्तेजार में निकल जाता है। सामान्यतः अपीलो की सुनवाई का कार्य लंच के बाद ही प्रारम्भ होता है जिसमें बहुत कम वादो की सुनवाई हो पाती है। इस संबंध में अनुरोध है कि आप अपने स्तर से इस संबंध में आवश्यक दिशा निर्देश निर्गत करते हुये अपीलीय वादों की सुनवाई की प्रक्रिया को व्यवस्थित कराने की कृपा करें। इसके अतिरिक्त अपीलीय वादों की अधिक संख्या को देखते हुये अपने स्तर से कमिश्नर, राज्य कर उत्तर प्रदेश एवं उ0प्र0 शासन को प्रस्ताव प्रेषित करते हुये अपीलीय कार्यालयों की संख्या को बढ़ाये जाने की कृपा करें। उल्लेखनीय है कि निकटवर्ती जिला गाजियाबाद में लगभग समान खंड होते हुये भी 6 अपीलीय अधिकारी कार्यरत है।

 यह कि प्रदेश में वाणिज्य कर विभाग को समाप्त हुये लगभग 8 वर्ष व्यतीत हो चुके है किन्तु वर्तमान में वाणिज्य कर विभाग के समय की बकाया की वसूली हेतु अभियान चलाया जा रहा है जिसमें हमें कोई आपत्ति नही है किन्तु 15 और 20 वर्ष पूर्व की मांग शेष रहना प्रदर्शित करते हुये व्यापारियों को बैंक खातो को सील किया जा रहा है अथवा बैंक के माध्यम से वसूली की जा रही है। इस प्रकार की डिमांड को केवल अपने रजिस्टर आदि में पेन्डिंग मानते हुये वसूली की कार्यवाही की जा रही है जबकि अधिकांश मामलो में यह बकाया राशि पूर्व में जमा है और केवल लिपिकीय वर्ग के द्वारा उसे डिस्पोस्ड में न लेकर पुनः वसूली की कार्यवाही की जा रही है। इस संबंध में पत्रावली आदि अवलोकन हेतु दिखाये जाने पर यह कहा जाता है कि इतनी पुरानी पत्रावली मिलना सम्भव नही है और यदि आपने जमा कर दिया है या अपील से समाप्त हो गया है तो आप अपना प्रमाण दें। जबकि विभाग को संबंधित वर्ष की पत्रावली और अभिलेखों से सत्यापन करने के पश्चात ही नियमानुसार वसूली की कार्यवाही करनी चाहिये। इस प्रकार इस तरह की कार्यवाही से एक ओर व्यापारी, उद्यमी का उत्पीड़न हो रहा है और दूसरी ओर विभाग एवं राज्य सरकार की छवि भी धूमिल हो रही है जो कि उचित नही है।

यह कि वर्तमान में लागू कर की व्यवस्था वस्तु एवं सेवा कर के अंर्तगत प्रत्येक वर्ष के लिये अन्तिम कर निर्धारण की कोई प्रक्रिया नियत नही है किन्तु फिर भी लगभग प्रत्येक माह के लिये आईटीसी की राशि में छोटे-छोटे अंतर के संबंध में नोटिस जारी किये जा रहे है जबकि इस प्रकार के अंतर एवं त्रुटियों को इस व्यवस्था में निर्धारित वार्षिक रिटर्न जीएसटीआर-09 दाखिल करते समय व्यापारी द्वारा स्वयं ही दूर कर दिया जाता है। प्रायः देखने में आया है कि प्रत्येक माह करोड़ो रुपैये आईटीसी देने वाली फर्मो को मात्र 2-4 हजार की आईटीसी के अंतर के आधार पर नोटिस देकर बार-2 सुनवाई हेतु बुलाया जाता है जिससे अधिकारी एवं व्यापारी वर्ग दोनो के समय की आनावश्यक बर्बादी होती है और इसका कोई लाभ भी विभाग को नही होता है क्योंकि इस प्रकार के अधिकांश मामलो में या तो उन्हें पेन्डिंग छोड़ दिया जाता है अथवा जारी की गयी नोटिस को निरस्त कर दिया जाता है।

यह कि र्पोटल पर पायी गयी विसंगतियों के संबंध में जारी एएसएमटी-10 के उत्तर के संबंध में मात्र इतना लिखकर कि “दिया गया उत्तर संतोषजनक नही है” मामले को धारा-73/74 में कंवर्ट कर दिया जाता है। कुछ मामलो में तो ध्ाारा-73 के आदेश में बिन्दुवार विवेचना न करते हुये केवल उत्तर संतोषजनक नही है लिखकर मांग सृजित की जा रही है जो न्याय संगत नही है।

यह कि धारा-161 के मामलों में तथ्यों का संज्ञान लिये बिना ही प्रार्थना पत्रों को अस्वीकार किया जाता रहा है जो कि धारा-161 के अंर्तगत दिये गये प्राविधानो के विरुद है।

यह कि वैट अवधि की बकाया धनराशियों के संबंध में डीआरसी-07ए जारी करते हुये वसूली की कार्यवाही की जा रही है जबकि वैट अवधि के रिफन्ड की धनराशि को जीएसटी की मांग के विरुद्ध समायोजित नही किया जा रहा है। कृपया इस संबंध में भी महोदय अपने स्तर से विधिसंगत कार्यवाही कराने का कष्ट करें।
(9)   यह कि पूर्व में ज्वांईट कमिश्नर (कार्यपालक) के स्तर पर इंटरप्रयोनर्स/व्यापारियों की मासिक बैठक आहूत की जाती रही है जिनमें अधिकाश समस्याओं का निराकरण तत्कालिक रुप से हो जाता था किन्तु पिछले कई माह से उक्त बैठक का आयोजन नही किया गया है जिसे निरन्तर रखने हेतु कृपया अधिनस्थ अध्ािकारियों को निर्दर्शित करने की कृपा करें।

प्रायः देखने में आया है कि मात्र छोटी-2 और लिपिकीय त्रुटियों के आधार पर सचलदल इकाई के अधिकारीगण वाहनों को रास्ते में रोक कर परेशान करते हैं और वाहनो को विभाग के कार्यालय में लाने से पूर्व वाहन चालको से मोबाईल आदि भी ले लेते हैं और न तो अपना नाम आदि बताते हैं और न ही अपनी यूनिट का कोई नम्बर आदि बताते हैं जिससे माल के स्वामी को वास्तविक स्थिति का पता ही नही चलता है और रात में वाहन को कार्यालय में लाकर खड़ा कर दिया जाता है और दिन में अधिकारी रात भर चैकिंग करने के कारण कार्यालय में नही मिलते है और वाहन स्वामी का काफी समय बर्बाद होता है। अतः इस व्यवस्था पर भी अंकुश लगाया जाये।

एक महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि वर्तमान व्यवस्था में किसी भी नोटिस अथवा आदेश को केवल पोर्टल पर अपलोड कर दिया जाता है और अधिकांश व्यापारी समय रहते नोटिस/आदेश को देख नही पाते जिसके कारण या तो उनके मामले में व्यापारी को अनुपस्थित मानकर और नोटिस का उत्तर नही दिया जाना मानते हुये एकपक्षीय रुप से निर्णय पारित कर दिया जाता है और आदेशों के मामले में अपील का निर्धारित समय निकल जाने के कारण अपील कालवाधित हो जाती है जिसके कारण मा0 उच्च न्यायालय जाने का ही एक मात्र्र विकल्प रह जाता है और मामला छोटे एवं निम्न स्तर का होने के कारण व्यापारी उच्च न्यायालय जा नही पाते। इस प्रकार आवश्यक यह है कि नोटिस/आदेशों की डिलीवरी कैसे कंफर्म की जाये जिससे कि समय रहते व्यापारी वर्ग की ओर से संदर्भित मामले में अपना पक्ष रखा जा सके।