राजनेता: क्या वह अपनी विचारधारा पर हमेशा कायम रहेंगे या नहीं?
भारत की राजनीति में राजनीतिक दलों एवं राजनेताओं की विचारधारा आज वर्तमान समय में शक के दायरे में खड़ी है। देश की जनता यह नहीं तय कर पा रही कि वह जिन राजनेताओं को चुनकर लोकसभा में भेजती है क्या वह अपनी विचारधारा पर हमेशा कायम रहेंगे या नहीं?
पिछले कुछ समय में हम सब ने देश भर में राजनेताओं को अपनी विचारधाराओं के साथ समझौता कर एक दूसरे के साथ खड़े होते हुए देखा है। जो राजनेता कई सालों तक एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते आ रहे थे वह सत्ता पाने के लिए आज अपनी विचारधाराओं को खत्म कर एक दूसरे के साथ सिर्फ सत्ता पाने के लिए खड़े हैं।
राजनेताओं का यह चरित्र देश की लोकतांत्रिक परंपराओं का गला घुटने के समान है। एक समय था जब भारत के राजनेता भारत माता की सेवा करने के लिए राजनीति के क्षेत्र में कदम रखते थे। परंतु वर्तमान में देश के परंपरागत राजनेताओं ने राजनीति को व्यापार एवं व्यवसाय मात्र बनाकर छोड़ दिया है। किसी भी परंपरागत राजनीतिक दल के चरित्र में देश सेवा हमें दूर-दूर तक नजर नहीं आती। भारत माता की सेवा करने के लिए एवं देश के लोकतंत्र को बचाए रखने एवं नेताओं के प्रति जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए जरूरी है।


