विश्व में बाघों की राजधानी - भारत
“निर्वनो वध्यते व्याघ्रो निर्व्याघ्रं छिद्यते वनम्। तस्माद्व्याघ्रो वनं रक्षेद्वयं व्याघ्रं च पालयेत् ॥ महाभारत – उद्योग पर्व : 5.29.57
जंगल न हो तो बाघ मारा जाता है; यदि बाघ न हो तो जंगल नष्ट हो जाता है। इसलिए, बाघ जंगल की रक्षा करता है और जंगल बाघ की रखवाली करता है! (महाभारत (कुंभगोनम संस्करण) - उद्योग पर्व: 5.29.57” )
5 से 6 हज़ार वर्ष पूर्व लिखा हुआ ये श्लोक भारत की उस आत्मा को दर्शाता है जिसके कारण आज पूरे विश्व के 70% बाघों का घर बन, भारत बाघों व उनके संरक्षण में पूरे विश्व की राजधानी बन कर उभरा है। फिर ये भी कोई अचरज की बात नहीं होनी चाहिए की अर्थशास्त्र के रचयिता चाणक्य ने सबसे पहले अपनी रचना में वनो और उनके प्राणियों के संरक्षण को एक औपचारिक रूप देने की दूरदर्शिता दिखाई थी। किसी राज्य द्वारा प्रोयाजित वन संरक्षण का संभवतः सबसे पुराना उदहारण हमे अर्थशास्त्र में ही दिखाई देता है।
19 वी सदी के प्रारम्भ में कभी 1 लाख बाघों के घर भारत में उनकी अक्षीण शिकार को हवा अंग्रेजी शाशन काल में लगी, उसका नतीजा था की लगभग 80000 बाघों का शिकार एक बड़े ही घिनौने और अमानवीय ढंग से खेल के रूप सन 1875 और 1925 के बीच में किया गया। जिसको अपनी खोखली बहादुरी साबित करनी होती थी वो किसी मचान पर छुप कर या किसी हांथी की पीठ की ऊंचाई के संरक्षण में एक अपने जीवन के खतरे से अनजान जीव के ऊपर गोली चला कर उसकी बलि चढ़ा देता था। भारत से चिताओं की विलुप्ति का मुख्य कारण यही रहा।
भारत की ब्रिटिश शाशन से मिली आज़ादी के बाद भी शिकार का ये घिनौना खेल चलता रहा और इसने एक औपचारिक रूप ले लिया जहाँ देश विदेश से लोग भारत के जंगलो में बाघ के शिकार के लिए आने लगे।
बाघों के शिकार पर अंकुश वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 के बनने के बाद लगा जो की बाघों के संरक्षण के तरफ पहली सीढ़ी थी । अगर वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 बाघों के संरक्षण की तरफ एक गंभीर नियत को दर्शाता था तो 1973 में विश्व प्रसिद्ध कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व से शुरू किया गया प्रोजेक्ट टाइगर उनके संरक्षण के तरफ जमीन पर एक पहला ठोस कदम, जिसमे की शुरआत में कुल 9 टाइगर रिज़र्व फारेस्ट बनाये गए जो की संरक्षण की दृष्टि से प्राथमिकता के मापदंड में सबसे ऊँचे पायदान पर होते है।
समय बदला और पग मार्क तकनीक से की गयी बाघों की जनगणना में तेज़ी से सुधार आने लगा, ऐसा लगा मानो सब पहले से तरह अब ठीक होने लगा है और हमारे जंगल के राजा अब इंसान द्वारा व्यवस्थित एक प्रणाली में अपनी एक सुरक्षित जगह पुनः बनाने में कामयाब हो गए हैं।
परन्तु ये किसी तूफ़ान से पहली आने वाली एक ख़ामोशी तब साबित हुई जब बाघों की सन 2006 में नयी विकसित कैमरा ट्रैप से हुई जनगणना में केवल 1411 बाघ पूरे भारत में रिकॉर्ड किये गए, ये अब तक की बाघों की सबसे कम औपचारिक संख्या थी। इस बार बाघों के जीवन का काल मुग़ल या ब्रिटिश शाशक नहीं परन्तु चीन का परंपरागत दवा उद्योग था। अब बाघों के शरीर के हर अंग का डिमांड चीन से आ रहा था जहाँ की बाघों के शरीर के लगभग हर अंग से कोई न कोई दवा बनाई जाती है। एक बाघ की कीमत अंतराष्ट्रीय बाजार में लगभग 50 लाख रूपए तक होती है जिसमे की उसकी खाल सबसे मॅहगी होती है।
इस चीन से आ रहे डिमांड को पूरा करने का सारा भार भारत के बाघ झेल रहे थे क्योंकि अन्य 12 बाघ वाले देशो में बाघ लगभग विलुप्ति की कगार पर थे।
सन 2010 में रूस में हुई एक बैठक में सभी 13 बाघ वाले देशो ने हिस्सा लिया और एक सिलसिलेवार तरीके से अपने अपने देशो में बाघों की संख्या को सन 2022 तक दोगुना करने का बीड़ा उठाया। हाल के कुछ वर्षो में इस बीड़े को सबसे अधिक नेतृव प्रेरणा प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के विचारों से मिला तब प्रतीत होता है जब आंकड़े ये बताते हैं की बाघों की संख्या में 42% की वृद्धि सन 2014 से सन 2022 के बीच में आयी है।
साभार - प्रकाश श्रीवास्तव (वन्यजीव विशेषज्ञ) सामाजिक कार्यकर्ता एव राजनीतिक विश्लेषक


