मंगल पांडे का बलिदान दिवस : इतिहास का सम्मान, राष्ट्र का दायित्व – विरेश तिवारी

मंगल पांडे का बलिदान दिवस : इतिहास का सम्मान, राष्ट्र का दायित्व – विरेश तिवारी

भारत की स्वतंत्रता केवल एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि अनगिनत बलिदानों और त्याग की परिणति है। जब भी स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत की बात होती है, तो सबसे पहले जिस नाम का स्मरण होना चाहिए, वह है महान क्रांतिकारी मंगल पांडे। 8 अप्रैल का दिन उनके बलिदान दिवस के रूप में देश की राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने का अवसर है, किंतु दुर्भाग्यवश आज यह दिवस उस व्यापक सम्मान और राष्ट्रीय स्तर की गंभीरता से नहीं मनाया जाता, जिसका वह अधिकारी है।

मंगल पांडे ने 1857 में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजाकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की नींव रखी। उस समय न कोई संगठित आंदोलन था और न ही स्वतंत्रता की स्पष्ट रणनीति, फिर भी एक युवा सैनिक ने अन्याय के विरुद्ध खड़े होकर पूरे देश में क्रांति की चिंगारी जगा दी। वरिष्ठ सामाजिक चिंतक विरेश तिवारी का मानना है कि यदि उस समय मंगल पांडे ने साहसिक कदम न उठाया होता, तो स्वतंत्रता आंदोलन को वह प्रारंभिक ऊर्जा शायद न मिल पाती, जिसने आगे चलकर पूरे राष्ट्र को संगठित किया।

आज आवश्यकता इस बात की है कि नई पीढ़ी को उनके जीवन, विचार और बलिदान से जोड़ा जाए। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं में उनके जीवन पर कार्यक्रम आयोजित होने चाहिए। विरेश तिवारी बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि राष्ट्र अपने नायकों को जितना याद करता है, उतना ही उसका भविष्य मजबूत होता है। दुख की बात है कि देश में अभी भी मंगल पांडे के नाम पर पर्याप्त सार्वजनिक संस्थान, पार्क, या स्मारक नहीं हैं, जिससे आम नागरिक प्रतिदिन उनके योगदान को स्मरण कर सके।

यह केवल सरकार का ही नहीं, बल्कि समाज का भी दायित्व है कि राष्ट्रीय नायकों को सम्मान देने की परंपरा मजबूत की जाए। यदि 8 अप्रैल को राष्ट्रीय स्तर पर संगोष्ठियाँ, युवा जागरण अभियान और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ, तो यह दिन नई पीढ़ी में राष्ट्रभक्ति और कर्तव्यबोध का संदेश दे सकता है। विरेश तिवारी का स्पष्ट मत है कि इतिहास को जीवित रखने के लिए उसे केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन में स्थान देना आवश्यक है।

मंगल पांडे किसी एक समाज या वर्ग के नहीं, बल्कि पूरे भारत के गौरव हैं। उनका बलिदान हमें यह संदेश देता है कि अन्याय के विरुद्ध उठी एक आवाज भी इतिहास बदल सकती है। 8 अप्रैल को राष्ट्रीय संकल्प दिवस के रूप में मनाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

लेखक — विरेश तिवारीवरिष्ठ उपाध्यक्षविश्व ब्राह्मण कल्याण परिषद