स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के भ्रामक दावों का सत्य और 'राजनीतिक छद्म' पर्दाफाश

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के भ्रामक दावों का सत्य और 'राजनीतिक छद्म' पर्दाफाश

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती द्वारा एक कथित 'एयरपोर्ट मुलाकात' के हवाले से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार जी पर लगाए गए आरोप न केवल साक्ष्यों की कसौटी पर विफल हैं, बल्कि वे एक गहरी राजनीतिक साजिश का हिस्सा प्रतीत होते हैं। इस विषय में इंद्रेश कुमार जी का आधिकारिक पक्ष, सांख्यिकीय प्रमाण और स्वामी जी के विरोधाभासी व्यवहार का विस्तृत विवरण यहाँ प्रस्तुत है :-

इंद्रेश कुमार जी का कड़ा खण्डन : सत्य की हत्या का प्रयास

इंद्रेश कुमार जी (मार्गदर्शक, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच) ने इस पूरे प्रकरण को अमानवीय बताते हुए स्पष्ट किया है :-

"संतों के प्रति श्रद्धा भारतीय संस्कृति का मूल है, और संघ इसका रक्षक रहा है। परंतु, स्वामी जी द्वारा लगाए गए आरोप पूर्णतः असत्य, असंवैधानिक और अमानवीय हैं। ऐसे बयान समाज में अकारण वैमनस्य और संशय का बीज बोते हैं। हमारा जीवन राष्ट्र और हिंदू समाज की सुरक्षा के लिए समर्पित है, न कि उसके विनाश के लिए।"

सांख्यिकीय वास्तविकता : 10 लाख का 'असम्भव' आंकड़ा

स्वामी जी का दावा '10 लाख हिन्दू कन्याओं' पर आधारित है, जो भारत की वर्तमान जनसांख्यिकी और सामाजिक स्थिति में पूरी तरह असंभव है :

विवाह दर का गणित : आधिकारिक 'नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5)' के अनुसार, भारत में अन्तर-पंथिय विवाहों की दर मात्र 2.1% से 2.5% है।

तुलनात्मक अध्ययन : यदि भारत में प्रतिवर्ष लगभग 1 करोड़ विवाह होते हैं, तो सभी समुदायों को मिलाकर कुल अन्तर-धार्मिक विवाहों की संख्या ही लगभग 2.5 लाख बैठती है। ऐसे में अकेले एक संगठन द्वारा 10 लाख हिन्दू लड़कियों का विवाह मुस्लिम परिवारों में कराने का दावा करना सांख्यिकीय रूप से एक हास्यास्पद झूठ है।

अतीक अहमद प्रकरण और 'चुनिंदा आक्रोश'

स्वामी जी की निष्पक्षता और उनके 'धर्म-रक्षक' होने के दावे पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न तब लगता है जब वे अपराधियों के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं :

आताताई अतीक अहमद का पक्ष : जिस अतीक अहमद ने अनगिनत अपराध किए, निर्दोषों की हत्याएं कीं और आतंक का साम्राज्य फैलाया, उसकी मौत पर भी स्वामी जी ने वर्तमान सरकार को कोसने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक दुर्दांत अपराधी के अन्त पर शोक संवेदना व्यक्त करना और न्याय प्रक्रिया पर सवाल उठाना यह दर्शाता है कि उनकी प्राथमिकता न्याय नहीं, बल्कि सरकार का विरोध है।

हिंदू ग्रंथों का अपमान : जब उत्तर प्रदेश, बिहार और आंध्र प्रदेश के नेताओं ने 'रामचरितमानस' जैसे पवित्र ग्रंथों को 'जहर' बताया और उसे जलाने की वकालत की, तब स्वामी जी का वह 'खून' क्यों नहीं खौला जो आज एक कथित मुलाकात पर खौल रहा है?

अखिलेश यादव का कार्यकाल : जिस सपा सरकार के दौरान '84 कोसी परिक्रमा' पर प्रतिबंध लगाया गया, सन्तों को जेलों में ठूंसा गया और उन पर लाठियां चलाई गईं, स्वामी जी ने उस समय उन शक्तियों का विरोध करने के बजाय चुप्पी क्यों साधे रखी? आज उन्हीं शक्तियों के प्रति उनकी सहानुभूति उनके राजनीतिक झुकाव को स्पष्ट करती है।

सनातन के अपमान पर चुप्पी : दक्षिण भारत के नेताओं द्वारा जब सनातन धर्म की तुलना 'डेंगू और मलेरिया' से की गई, तब स्वामी जी ने वैसी आक्रामकता क्यों नहीं दिखाई जैसी वे आज हिन्दू हित में कार्यरत राष्ट्रवादी संगठनों के प्रति दिखा रहे हैं।

राजनीतिक पृष्ठभूमि :कांग्रेस और एनएसयूआई का प्रभाव

स्वामी जी के बयानों की दिशा हमेशा एक विशिष्ट राजनीतिक गलियारे की ओर झुकी रही है :

अतीत का प्रभाव : कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई से उनकी जुड़ी पृष्ठभूमि आज भी उनके विमर्श में झलकती है।

वर्तमान सरकारों का विरोध : उत्तर प्रदेश और केन्द्र की सरकारें जो राम मन्दिर निर्माण, काशी-विश्वनाथ कॉरिडोर और सांस्कृतिक गौरव की पुनर्स्थापना के लिए कार्य कर रही हैं, स्वामी जी सदैव उनके कार्यों में दोष ढूंढने और विरोध करने में अग्रणी रहते हैं।

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का वास्तविक संकल्प

इंद्रेश कुमार के नेतृत्व में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का उद्देश्य मुसलमानों को विदेशी आक्रांताओं के प्रभाव से मुक्त कर उन्हें 'भारतीय जड़ों' (DNA और पूर्वजों) से जोड़ना है।

लव जिहाद का प्रतिरोध : MRM ने सार्वजनिक रूप से 'लव जिहाद' को हिन्दू समाज के लिए खतरा माना है और इसके विरुद्ध आवाज उठाई है।

सिद्धान्तों का हनन : 10 लाख हिन्दू बेटियों को मुस्लिम घरों में भेजने का आरोप उस विचारधारा के बिल्कुल विपरीत है जिसने मुसलमानों को 'राष्ट्रप्रथम' का पाठ पढ़ाया है।

धर्म की आड़ में राजनीतिक एजेण्डा

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का बयान तथ्यों के धरातल पर शून्य है। यह समाज में असुरक्षा और भ्रम पैदा करने का एक सुनियोजित प्रयास है। अतीक अहमद जैसे अपराधियों के लिए सहानुभूति और राष्ट्रवादी संगठनों के लिए विषवमन यह स्पष्ट करता है कि उनके सरोकार आध्यात्मिक नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से राजनीतिक हैं। हिन्दू समाज को ऐसे 'छद्म-विमर्श' से सावधान रहना चाहिए जो धर्म की आड़ में राजनीतिक एजेण्डा चला रहे हैं। 10 लाख का आंकड़ा मात्र एक 'कपोल-कल्पना' है, जिसका उद्देश्य केवल सनसनी फैलाना और राष्ट्रवादी ताकतों को कमजोर करना है।

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