आईजीएनसीए ने अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर किया संगोष्ठी का आयोजन

आईजीएनसीए ने अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर किया संगोष्ठी का आयोजन

नई दिल्ली। इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के संरक्षण और सांस्कृतिक अभिलेखागार प्रभाग ने अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के उपलक्ष्य में ‘संग्रहालय और अभिलेखागार: शिक्षा हेतु एक सार्वजनिक स्थान’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया। संगोष्ठी की अध्यक्षता आईजीएनसीए के डीन (प्रशासन) व कला निधि प्रभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने की। इस कार्यक्रम का उद्देश्य आईजीएनसीए सांस्कृतिक अभिलेखागार के प्रति जागरूकता पैदा करना और अधिक आगंतुकों को आकर्षित करना है, जिससे छात्रों, कलाकारों और शोधकर्ताओं को लाभ हो सके। इस संगोष्ठी के प्रतिष्ठित वक्ताओं में आईजीएनसीए के संरक्षण एवं अभिलेखागार प्रभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अचल पंड्या, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. वीरेंद्र बांगड़ू, पुरालेखापाल डॉ. के. संजय झा, मीडिया सेंटर की उपनियंत्रक सुश्री श्रुति नागपाल और एयूडी, दिल्ली के डिप्टी डीन (अकादमिक) डॉ. आनंद बर्धन शामिल थे। डॉ. के. संजय झा ने स्वागत भाषण दिया।

संगोष्ठी के अन्य वक्ताओं में आईजीएनसीए की सुश्री गुंजन वी. जोशी, सहायक प्रोफेसर डॉ. सत्येन्द्र कुमार, प्रोजेक्ट असिस्टेंट सदीश शर्मा और प्रोजेक्ट एसोसिएट रघुराम एस.के. शामिल थे। संगोष्ठी में विचार व्यक्त करते हुए डॉ. आनंद बर्धन ने कहा कि भारत में संग्रहालयों के बारे में यह धारणा त्रुटिपूर्ण है कि ये औपनिवेशिक निर्माण हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत में प्राचीन काल से कला, संस्कृति, साहित्य और ज्ञान के भंडार को बनाए रखने की एक लंबी परम्परा रही है। उन्होंने ‘नारद शिल्प’ जैसे ग्रंथों का हवाला दिया, जो संग्रहालय बनाने और गृह कलाकृतियों के लिए विभिन्न प्रावधानों को वर्गीकृत करने के सिद्धांतों को रेखांकित करता है। यह दर्शाता है कि भारत में संग्रहालय विज्ञान पर उर्वर विमर्श पहले से ही मौजूद है। डॉ. बर्धन ने संग्रहालय विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय ज्ञान प्रणाली को एकीकृत करने की आवश्यकता दोहराई।

प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में आईजीएनसीए को ‘लघु संस्कृति मंत्रालय’ के रूप में वर्णित किया। उन्होंने कला और संस्कृति में आईजीएनसीए की व्यापक भागीदारी पर प्रकाश डाला और पेशेवरों की उनके अच्छे काम के लिए सराहना की। उन्होंने मंगोलिया की अपनी हालिया यात्रा का हवाला देते हुए, अपनी विरासत और संस्कृति को प्रदर्शित करने में संग्रहालयों के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि वह मंगोलिया के संग्रहालय के राष्ट्रीय इतिहास और विरासत के रखरखाव से काफी प्रभावित हुए।

डॉ. श्रुति नागपाल ने अपने पेपर ‘प्रैक्टिसेज, रिसर्च एंड डॉक्युमेंटेशन अराउंड फिल्म कल्चर्स’ में आईजीएनसीए के फिल्म अभिलेखागार का उल्लेख करते हुए फिल्म अभिलेखीकरण के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल की। उन्होंने चर्चा की कि फिल्म अभिलेखागार क्या हैं और आईजीएनसीए के फिल्म अभिलेखागार वैश्विक परम्परा और अनुसंधान को कैसे प्रेरित करते हैं। डॉ. नागपाल ने मीडिया संसाधनों के लोकतंत्रीकरण और प्रसार में फिल्म अभिलेखागारों की भूमिका पर जोर दिया।

वीरेंद्र बांगरू ने ‘रिविजिटिंग म्यूजियम्स फॉर एजुकेशन एंड रिसर्च- ए केस स्टडी ऑफ म्यूजियम्स इन हिमालय रीजन सपोर्टेड बाई आईजीएनसीए’ शीर्षक से एक पेपर प्रस्तुत किया। इसमें उन्होंने हिमालयी क्षेत्र में आत्मनिर्भर संग्रहालय मॉडल बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस का उद्देश्य सांस्कृतिक आदान-प्रदान, सांस्कृतिक संवर्धन और आपसी समझ, सहयोग व शांति को बढ़ावा देने के महत्वपूर्ण साधन के रूप में संग्रहालयों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस की इस वर्ष की थीम, ‘शिक्षा और अनुसंधान के लिए संग्रहालय’ समग्र शैक्षिक अनुभव प्रदान करने तथा एक जागरूक, चिरस्थायी और समावेशी दुनिया की हिमायत करने में सांस्कृतिक संस्थानों की भूमिका पर जोर देती है। 2024 के अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के लिए अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय परिषद् (ICOM) ने कुछ लक्ष्य निर्धारित किए है। इसमें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा (समावेशी और समान गुणवत्ता वाली शिक्षा सुनिश्चित करना और सभी के लिए आजीवन सीखने के अवसरों को बढ़ावा देना) और उद्योग, नवाचार व बुनियादी ढांचा (लचीले बुनियादी ढांचे का निर्माण, समावेशी और टिकाऊ औद्योगीकरण तथा नवाचार को बढ़ावा देना) का लक्ष्य शामिल है। संगोष्ठी का उद्देश्य एप्लाइड म्यूजियमोलॉजी, कला इतिहास और भारतीय सौंदर्यशास्त्र के युवा अध्येताओं, शोधकर्ताओं और छात्रों को शामिल करना था, ताकि उन्हें आईजीएनसीए के अभिलेखीय संग्रहों की एक झलक देकर शिक्षित किया जा सके तथा भारतीय कला और संस्कृति के महत्त्व के बारे में युवा मस्तिष्कों में एक जगह बनाई जा सके।

आईजीएनसीए अपने समृद्ध सांस्कृतिक संग्रह को बढ़ावा देने के लिए नियमित रूप से सम्मेलन, पैनल चर्चा, सेमिनार और स्मारक व्याख्यान आयोजित करता है। छात्रों और समकालीन शोधकर्ताओं के बीच जागरूकता बढ़ाने के लिए सहयोगात्मक परियोजनाएं, कार्यक्रम, प्रदर्शनियां और संगोष्ठियां भी आयोजित की जाती हैं। हाल ही में, मई 2024 में आईजीएनसीए के प्रयासों को ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर में’ भारत की तीन पांडुलिपियों को शामिल करके, विश्व स्तर पर मान्यता दी गई। इस संदर्भ में विदित हो कि यूनेस्को के ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर’ में तीन कालजयी भारतीय साहित्यिक कृतियों- ‘रामचरितमानस’, ‘पंचतंत्र’ और ‘सहृदयलोक-लोचन’ की पांडुलिपियों को शामिल किया गया।