AI की अंधेरी दुनिया और हमारा भविष्य - अनुज अग्रवाल 

AI की अंधेरी दुनिया और हमारा भविष्य - अनुज अग्रवाल 

मेरे एक करीबी रिश्तेदार अमेरिका में आईटी कंपनी में बड़े पद पर कार्यरत हैं । उनकी कंपनी “अमेरिकन एयरलाइंस” के लिए एआई सेटअप तैयार कर रही है । कल उनका फ़ोन आया था और वे बता रहे थे कि सन 2027 में उनकी कंपनी अमेरिकन एयरलाइंस के लिए 2500 एआई एजेंट्स तैयार करके देने वाले हैं ।

एक एआई एजेंट 20 कुशल पेशेवर लोगों की जगह ले लेगा । हर पाँच एआई एजेंटस के संचालन के लिए एक सीनियर मैनेजर नियुक्त किया जाएगा । यानि कुल मिलाकर पचास हज़ार वर्क फ़ोर्स की जगह ये 2500 एआई मैनेजर ले लेंगे और इनके संचालन के लिए मात्र पाँच सौ उच्च प्रशिक्षित एआई इंजीनियर नियुक्त किए जाएँगे । यानि 49500 लोग सड़क पर आ जाएँगे । एक एआई एजेंट को एक साल ऑपरेट करने की लागत मात्र 15 - 20 हज़ार डॉलर तक ही आएगी । यानि एयरलाइनएस का मेन पावर का खर्च  5% से भी कम रह जाएगा । इसी तरह एआई का उपयोग विश्व की सभी फार्च्यून 500 कंपनी करने जा रही हैं ।

विश्व की सभी MSME इन्हीं फॉर्च्यून 500 कंपनियों को उत्पाद सप्लाई करती हैं और उन्हें भी मजबूर होकर अपनी लागत घटाने के लिए एआई एजेंट के माध्यम से काम करना होगा । जिससे सभी छोटी बड़ी कंपनियों में मात्र 5 से 10%  मैनपावर की ही आवश्यकता रह जाएगी । और यह सब बस अगले एक दो सालों में होने जा रहा है । सारी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्थाएं भरभरा कर गिर जायेंगी । दुनिया के सभी देशों की सरकारें इन्ही कंपनियों की गुलाम हैं । दुनिया के 10% लोग कुल जीडीपी का 90% खर्च करते हैं और बाक़ी 90% मात्र 10%। और डर है कि टेक्नोलॉजी के नए खेल इन 90% की जिंदगी और भविष्य को जड़ से न मिटा दें । 

इसीलिए कहा जा रहा है कि  AI आ रहा है और सभी जॉब खा रहा है । देश के देश निगलने वाला है यह । क्लाइमेट चेंज से भी बड़ी आपदा है यह । जल्द दुनिया भर में सरकारों को “ यूनिवर्सल पेंशन स्कीम “ शुरू करनी पड़ेगी क्योंकि सब काम रोबोट, मशीन और एआई से होंगे और लोग बजायेंगे “ घंटा “। जब लोग खाली बैठेंगे तो मानसिक रोग बढ़ेंगे और महामारियां भी , गृहयुद्ध भी और विश्व युद्ध भी ।
टेक्नोलॉजी हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी है, लेकिन एक डरावना साया तेज़ी से फैल रहा है “न्यू वर्ल्ड ऑर्डर” का,जिसमें एआई (AI) सबसे बड़ी भूमिका अदा करेगा।

जो 10 % लोग बच जाएँगे उनके लिए भी यह  कोई राजनीतिक बदलाव नहीं माना जा रहा, बल्कि बची खुची मानवता को एक ऐसी डिजिटल ज़ंजीर में बाँधने की योजना बताया जाता है, जहाँ आज़ादी का अर्थ समाप्त हो  जाएगा और हर इंसान एक केंद्रीय सर्वर से जुड़ा हुआ सिर्फ एक “कोड” बनकर रह जाएगा। 

कल्पना कीजिए एक ऐसी दुनिया की, जहाँ आपको जेब में बटुआ या हाथ में मोबाइल रखने की ज़रूरत नहीं होगी। आपके हाथ का एक इशारा दरवाज़े खोल देगा और एक स्कैन से आपके बैंक खाते से भुगतान हो जाएगा। ऊपर से यह सुविधा जैसी लगेगी, लेकिन कहा जाता है कि इसके पीछे छिपी सच्चाई बहुत डरावनी हो सकती है। यह चिप आपकी कलाई या माथे की त्वचा के नीचे लगाई जाएगी और सीधे आपके नसों के सिस्टम से जुड़ी होगी।
 

इस व्यवस्था का पहला कदम “कैशलेस सोसाइटी” बनाना बताया जाता है। जब दुनिया से कागज़ी पैसा खत्म हो जाएगा और सारा धन सिर्फ डिजिटल नंबरों के रूप में किसी वैश्विक बैंक में रहेगा, तो इंसान की रोज़ी-रोटी का कंट्रोल उसके अपने हाथ में नहीं रहेगा, बल्कि इस सिस्टम को चलाने वालों के पास चला जाएगा। अगर कोई आदमी इस वैश्विक शासन की नीतियों से असहमति जताएगा, तो उसे जेल भेजने की ज़रूरत नहीं होगी। सिर्फ एक बटन दबाकर उसकी चिप को “डी-एक्टिवेट” कर दिया जाएगा। उस पल वह आदमी दुनिया के लिए लगभग गायब हो जाएगा, वह न खाना ख़रीद पाएगा, न सफ़र कर पाएगा और न ही इलाज करा पाएगा। 

इसे “डिजिटल गुलामी” की सबसे कठोर शक्ल के रूप में पेश किया जाता है, जिसका ज़िक्र कुछ प्राचीन धार्मिक किताबों में भी मिलता है।

इस विचार के अनुसार “ट्रांसह्यूमनिज़्म” के ज़रिए इंसान को मशीनों से जोड़कर सुपर ह्यूमन बनाने की बात की जाती है। कहा जाता है कि माइक्रोचिप बीमारियाँ पहले पहचान लेगी और दिमाग की क्षमता बढ़ाएगी, लेकिन आलोचकों का मानना है कि यह इंसान की सोच और भावनाओं को भी कंट्रोल कर सकती है।

स्मार्ट सिटीज़ में एआई कैमरे हर गतिविधि पर नज़र रखेंगे। कुछ लोग इसे ग्लोबल कंट्रोल की ओर क़दम मानते हैं। न्युरोलिंक  दिमाग-कंप्यूटर कनेक्शन पर काम कर रही है। एआई समर्थकों के लिए यह तकनीकी तरक्की है, जबकि आलोचकों (कांस्पीरेसी वाले) के लिए संभावित “डिजिटल कंट्रोल” का ख़तरा।